सोमवती अमावस्या का महत्व

सोमवती अमावस्या का महत्व 

सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या सोमवती अमावस्या कहलाती है, हिंदी मास के अनुसार प्रत्येक मास में अमावस्या आती है । लेकिन जब किसी भी माह में सोमवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ती है तो उसे, सोमवती अमावस्या कहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सोमवार चंद्रमा का दिन हैं। इस दिन (प्रत्येक अमावस्या को) सूर्य तथा चंद्र एक सीध में स्थित रहते हैं। इसलिए यह पर्व विशेष पुण्य देने वाला तथा अक्षय फल को देने वाला होता है तथा इस दिन किया गया स्नान,व्रत,जप,तप ,दान का महत्त्व हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी दिया गया है। हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि सोमवार को अमावस्या बड़े भाग्य से ही पड़ती है, पाण्डव पूरे जीवन तरसते रहे, परंतु उनके संपूर्ण जीवन में सोमवती अमावस्या नहीं आई। यह पितृ दोष के निवारण में भी सहायक है, हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, सोमवती अमावस्या के दिन अपने पितरो के निमित दिया गया पिंड दान अक्षय फल तथा पितरो को संतुष्ट करने वाला होता है तथा उस व्यक्ति पर अपने पितरो की विशेष अनुकम्पा बानी रहती और साथ ही वह व्यक्ति अपने पितरो का प्रिय भी होता है।

इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है,जो मनुष्य गंगा स्नान को नहीं जा सकते, वे अपने घर में हीं पानी में गंगा जल मिला कर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करें।  इस दिन मौन रहकर स्नान करने से सहस्त्र गौ दान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र के ब्रह्मा सरोवर में स्नान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा। ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

सोमवती अमावस्या का व्रत विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु तथा पितरो की शांति के लिये करती है । इसे अश्वत्थ (पीपल) प्रदक्षिणा व्रत भी कहते हैं। इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्म तथा स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन लें। सोमवती अमावस्या के दिन सर्वप्रथम भगवान सूर्य को जल देना चाहिए,अब सभी पूजन सामग्री लेकर पीपल के वृक्ष के पास जायें और पीपल की जड़ में लक्ष्मी नारायण की स्थापना करके दूध /जल अर्पित करें। पीपल की जड़ में सूत लपेट दें फिर पीपल के वृक्ष की पूजा व पेड़ की जड़ में दीपक जला कर भगवान का ध्यान करके पुष्प, अक्षत, चन्दन, भोग, धूप इत्यादि अर्पण करें। इस दिन भगवान् लक्ष्मी-नारायण के साथ शनि देव की भी विधिवत पूजा करनी चाहिये और  फिर प्रेमपूर्वक हाथ जोड़कर भगवान की प्रार्थना करें। अब पेड़ के चारों ओर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ” बोलते हुए 108 बार परिक्रमा करें। इसके बाद कथा सुनें अथवा सुनाये। सामर्थ्यानुसार दान दें। ऐसा करने से भगवान पुत्र, पौत्र, धन, धान्य तथा सभी मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

सोमवती अमावस्या व्रत विधि और कथा

सोमवती अमावस्या पर स्नान-दान करने की भी महत्व है। वैसे तो इस दिन गंगा-स्नान का विशिष्ट महत्व माना गया है, परंतु जो लोग गंगा स्नान करने नहीं जा पाते, वे किसी भी नदी या सरोवर या तट पर स्नान करके लाभ ले सकते है, अगर यह भी संभव नहीं है तो घर पर ही रहकर गंगा स्नान का लाभ उठा सकते है , बस इतना सा करना है की अपने स्नान के जल में आपको गंगा जल मिला लेना है और माँ गंगा और अपने इष्ट का ध्यान करते हुए मौन रहकर स्नान करना है , हाँ एक और बात बता दूँ कि इस दिन मौन रहने का बहुत ही अधिक महत्व है,इस पर अर्थात मौन रहने का क्या
महत्व है उस पर फिर चर्चा करेंगे….
स्नान आदि से निर्वित हो कर स्वच्छ वस्त्र पहन लें और मन ही मन में अपने इष्ट या अपने गुरु का निरंतर ध्यान करते रहे । अब पूजन की सम्पूर्ण सामग्री लेकर पीपल तथा शिव-पार्वती और तुलसीजी का पूजन विधिवत कर सोमवती अमावस्या का लाभ उठायें ।

भारतवर्ष में सोमवती अमावस्या का व्रत विवाहित स्त्रियाँ अपने अखंड सौभाग्य तथा पति और अपने बच्चो की लम्बी आयु के लिये करती है । इसे अश्वत्थ (पीपल) प्रदक्षिणा व्रत भी कहते हैं।

सोमवती अमावस्या की कथा

जब युद्ध के मैदान में सारे कौरव वंश का सर्वनाश हो गया, भीष्म पितामह शर-शैय्या पर पड़े हुए थे। उस समय युधिष्ठर भीष्म पितामह जी से पश्चाताप करने लगे, धर्मराज कहने लगे। हे पितामह! दुर्योधन की बुरी सलाह पर एवं हठ से भीम और अर्जुन के कोप से सारे कुरू वंश का नाश हो गया है। वंश का नाश देखकर मेरे हृदय में दिन रात संताप रहता है। हे पितामह! अब आप ही बताइये कि मैं क्या करू, कहाँ जाऊँ, जिससे हमें शीघ्र ही चिरंजीवी संतति प्राप्त हो। पितामह कहने लगे, हे! राजन् धर्मराज मैं तुम्हें व्रतों में शिरोमणि व्रत बतलाता हूँ जिसके करने एवं स्नान करने मात्र से चिरंजीवी संतान एवं मुक्ति प्राप्त होगी। वह है सोमवती अमावस्या का व्रत-हे राजन्! यह व्रतराज (सोमवती अमावस्या का व्रत) तुम उत्तरा से अवश्य कराओ जिससे तीनों लोकों में यश फैलाने वाला पुत्र रत्न प्राप्त होगा। धर्मराज ने कहा, कृपया पितामह इस व्रतराज के बारे में विस्तार से बताइये ये सोमवती कौन है ? और इस व्रत को किसने शुरू किया। इस महात्यम को सुनने की हमारी प्रबल इच्छा है तथा पूर्ण श्रद्धा है…हे पितामह जगत कल्याण हेतु आप इस महात्यम को हम से  कहे…………

भीष्म जी ने कहा- हे युधिष्ठिर ! हे पांडुनंदन ,  कांची नाम की महापुरी है, वहाँ महा पराक्रमी रत्नसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में देवस्वामी नामक ब्राह्मण निवास करता था उसके सात पुत्र एवं गुणवती नाम की कन्या थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षुक भिक्षा माँगने आया। उसकी सातों बहुओं ने अलग-अलग भिक्षा दी और सौभाग्यवती का आर्शीवाद पाया। अंत में गुणवती ने भिक्षा दी। भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आर्शीवाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए। गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के वैधव्य मिटाने का उपाय कहिए। तब वह भिक्षुक कहने लगा- हे पुत्री! यदि तेरे घर सौमा आ जाए तो उसके पूजन मात्र से ही तेरी पुत्री का वैधव्य मिट सकता है। गुणवती की माँ ने कहा कि पण्डित जी यह सौमा कौन है? कहाँ निवास करती है, क्या करती है? विस्तार से बताइये। भिक्षु कहने लगा- भारत के दक्षिण में समुद्र के बीच एक द्वीप है जिसका नाम सिंहल द्वीप है। वहाँ पर एक कीर्तिमान धोबी निवास करता है। उस धोबी के यहाँ सौमा नाम की स्त्री है, वह तीनों लोकों में अपने सत्य के कारण पतिव्रत धर्म से प्रकाश करने वाली सती है। उसके सामने भगवान एवं यमराज को भी झुकना पड़ता है जो जीव उसकी शरण में जाता है तो उसका क्षण मात्र में ही उद्धार हो जाता है। सारे दुष्कर्मों, पापों का विनाश हो जाता है, अथाह सुख वैभव की प्राप्ति हो जाती है। तुम उसे अपने घर ले आओ तो आपकी बेटी का वैधव्य मिट जाएगा।

देवस्वामी के सबसे छोटे पुत्र शिवस्वामी अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप को गया। रास्ते में समुद्र के समीप रात्रि में गृद्धराज के यहाँ विश्राम किया। सुबह होते ही उस गृद्धराज ने उन्हें सिंघलद्वीप पहुँचा दिया और वे सौमा के घर के समीप ही ठहर गये। इसके बाद वह दोनों भाई बहिन प्रात: काल के समय उस धोबी की पत्नी सोमा के घर की चौक को साफ़ कर उसे प्रतिदिन लीप पोत कर सुन्दर बनाते थे और उसकी देहरी पर प्रतिदिन आटे का चौक पूजकर अरहैन डाला करते थे। उसी समय से आज भी देहरी पर अरहैन डालने की प्रथा चली आ रही है। इस प्रकार इसे करते करते उन्हें वहाँ एक साल बीत गया। इस प्रकार की स्वच्छता को देखकर सोमा ने विस्मित हो कर अपने पुत्रों एवं पुत्रवधुओं से पूछा कि यहाँ कौन झाडू लगाकर लीपा पोती करता है कौन अरहैन डालता है मुझे बताओ उन्होंने कहा हमें नहीं मालूम और न ही हमने किया है तब एक दिन उस धोबिन ने रात में छिपकर पता किया तो ज्ञात हुआ कि एक लड़की आँगन में झाडू लगा रही है और एक लड़का उसे लीप रहा है। सौमा ने उन दोनों को पूछा तुम कौन हो तो उन्होंने कहा हम दोनों भाई बहन ब्राह्मण हैं। सौमा ने कहा तुम्हारे इस कार्य से मैं जल गई, मैं बर्बाद हो गयी इस पाप से मेरी जाने क्या दशा होगी हे विप्र मैं धोबिन हूँ आप ब्राह्मण हैं फिर आप यह विपरीत कार्य क्यों कर रहे हो। शिवस्वामी ने कहा यह गुणवती मेरी बहिन है इसके विवाह के समय सप्तवदी के बीच वैधव्य योग पड़ा है। आप के पास रहने से वैधव्य योग का नाश हो सकता है इसलिए हम यह दास कर्म कर रहे हैं। सोमा ने कहा अब आगे से ऐसा मत करना मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।

सोमा ने अपनी वधुओं से कहा मैं इनके साथ जा रही हूँ यदि मेरे राज्य में मेरा व्यक्ति मर जाए जब तक मैं लौटकर न आ जाऊँ तब तक उसका क्रिया कर्म मत करना और उसके शरीर को सुरक्षित रखना किसी के कहने पर जला मत देना। ऐसा कह दोनों को लेकर समुद्र मार्ग से होकर कांची नगरी में पहुँच गयी। सोमा को देखकर धनवती ने प्रसन्न हो उसकी पूजा अर्चना की सोमा ने अपनी मौजूदगी में गुणवती का विवाह रुद्र शर्मा के साथ सम्पन्न करा दिया फिर वैवाहिक मंत्रों के साथ हवन करवा दिया। उसके बाद सप्तसदी के बीच रुद्र शर्मा की मृत्यु हो गयी अर्दना बहिन को विधवा जानकर सारे घरवाले रोने लगे किन्तु सोमा शांत रही। सोमा ने अति विलाप देखकर अपना व्रतराज सत्य समझाया और व्रतराज के प्रभाव से होने वाला मृत्यु विनाशक पुष्प विधि पूर्वक संकल्प करके दे दिया। रुद्र शर्मा व्रतराज के प्रभाव से शीघ्र जीवित हो गया। उसी बीच उस सोमा के घर में पहले उसके लड़के मरे फिर उसका पति मरा फिर उसका जमाता भी मर गया। सोमा ने अपने सत्य से सारी स्थिति जान ली वह घर चलने लगी। उस दिन सोमवार का दिन था अमावस्या की तिथि भी थी, रास्ते में सोमा ने नदी के किनारे स्थित एक पीपल के पेड़ के पास जाकर नदी में स्नान किया और विष्णु भगवान की पूजा करके शक्कर हाथ में लेकर 108 प्रदाक्षिणाऐं पूरी की। भीष्म जी बोले जब सोमा ने हाथ में शक्कर लेकर 108वीं प्रदक्षणा पूरी की तभी उसके पति जमाता और पुत्र भी सभी जीवित हो गये और वह नगर लक्ष्मी से परिपूर्ण हो गया। विशेष कर उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। भीष्म जी कहने लगे हमने यह वृतराज का फल विस्तार से कह सुनाया।
यदि सोमवार युक्त अमावस्या अर्थात सोमवती अमावस्या हो तो पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ है। तुम भी यह व्रत धारण करो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।

हे अर्जुन ! कलियुग में जो सतिया सोमवती के चरित्र का अनुशरण करेंगी, सोमवती के गुणों का गुणवान करेंगी, वह संसार में सुयश प्राप्त करेगी। जो व्यक्ति सोम के आदर्शो का अनुसरण करेगा, धोबियों को धन देगा, सोमवती अमावस्या के दिन व्रतराज के समय धोबियों को यथा दक्षिणा देगा तथा भोज करायेगा, धोबी के बालक बालिकाओं को पुस्तक दान करेगा, वह सदा अनरता को प्राप्त करेगा। विवाह के समय कोई भी वर्ग की कन्या की माँग में सिन्दूर धोबी की सुहागिन स्त्री से भरवायेगा उसको स्वर्ण या रत्न दान करेगा तो उसकी कन्या का सुहाग दीर्घायु होता है तथा वैधव्य योग का प्रभाव नष्ट हो जाता है, जो धोबी की कन्याओं का अपमान करेगा चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों न हो जन्म जन्म तक नरक में पड़ा रहेगा।
जब उस ब्राह्मण ने अद्भुत चमत्कार देखा तो वह सोमा के चरणों में गिर गया धूप, दीप, पुष्प, कपूर से आरती की विभिन्न प्रकार से पूजा अर्चना की बार-बार जगत पूज्य, सर्वशक्तिमान हो युगों-युगों तक आपकी पूजा यह ब्राह्मण वंश करेगा जो उपकार आपने किया है वह भुलाने योग्य नहीं है आपके साथ-साथ आपके वंश की जो सतियां आपके चरित्र का अनुसरण करेंगी उसकी आपकी ही भाँति युगों-युगों तक पूजा होगी।

पूजन विधि :

* हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में शिवजी तथा अग्रभाग में ब्रह्माजी का निवास होता है। अत: इस दिन पीपल के पूजन से सौभाग्य की वृद्धि होती है।

* सोमवती अमावस्या के दिन पीपल की परिक्रमा करने का विधान है। उसके बाद गरीबों को भोजन कराया जाता हैं।

* सोमवती अमावस्या के दिन की यह भी मान्यता है कि इस दिन पितरों को जल देने से उन्हें तृप्ति मिलती है।

* महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर तीर्थस्थलों पर पिंडदान करने का विशेष महत्व है।

* सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें।

* सोमवती अमावस्या के दिन सूर्य नारायण को जल देने से दरिद्रता का नाश होता है।

* जिन लोगों की पत्रिका में चंद्रमा कमजोर है, वह जातक गाय को दही और चावल खिलाएं तो उन्हें मानसिक शांति प्राप्त होगी।

* पर्यावरण को सम्मान देने के लिए भी सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करने का विधान माना गया है।

* भाग्योदय के लिए सोमवती अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष का रोपण एवं उसका पालन पोषण करने से जन्म-जन्मांत के पाप नष्ट हो जाते है और जैसे-जैसे वृक्ष की वृद्धि होती है,वैसे-वैसे उस व्यक्ति का भाग्योदय होता है।

* सोमवती अमावस्या के दिन मौन रहने का बहुत अधिक महात्यम कहा गया है । हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि इस दिन मौन रहने से व्यक्ति में वाक्पटुता (अर्थात वाणी के द्वारा लोगो को अपनी और आकर्षित करने की कला की वृद्धि होती है ) की वृद्धि होती है। इस से व्यक्ति की सामाजिक और मानसिक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होती है ।

* विशेष करके सोमवती अमावस्या के दिन सुहागिन धोबन को सुहाग की सामग्री एवं वस्त्र दक्षिणा सहित देने का विशेष महत्त्व है । अगर संभव हो सके तो भोजन इत्यादि भी करा सकते है अन्यथा भोजन का सामान भी वस्त्र इत्यादि के सहित भी दे सकते है ।

* जिनकी भी लड़की की नई शादी हुई तो उन को विशेष करके किसी भी सुहागन धोबन से अपनी मांग भर वानी  चाहिये और उसको भेंट स्वरूप जो संभव हो सके दान- दक्षिणा देनी चाहिये.

सोमवती अमावस्या के उपाय

1. पितृ दोष निवारण हेतु उपाय :

  • पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति को अपने पितरो के निमित किसी धार्मिक स्थान पर पिंड दान करना ।
  • पितृरों के लिए गंगा स्नान इत्यादि करके भगवान् सूर्यनारायण को अर्घ प्रदान करना चाहिए ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन गरीबो के लिए भोजन की व्ययवस्था करनी चाहिए ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन पुस्तके,कॉपी, पेन-पेंसिल,आदि का दान बहुत ज्यादा पुण्यकारी काहा गया है ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन भूलकर भी क्षौर और बाल आदि को काटना सख्त मनाई है,ऐसा करना पितरो को कष्ट पहुंचाता है।
  • सोमवती अमावस्या के दिन गोबर के कंडे जलाकर उस पर खीर का भोग लगाना चाहिए, ऐसा करना पितरो को अत्यधिक प्रिय है और पितृ उस व्यक्ति के सम्पूर्ण मनोरथ को सिद्ध करते है ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन कौओ, कबूतर , मछलियां आदि पशु-पक्षियों को भोजन डालना भी बहुत लाभप्रद होता है , इस उपाय को करने से भी पितृ दोष में शांति होती है ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन गायत्री मंत्र का जप एवं मंत्र द्वारा हवन करना उत्तम होता है।इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पठन उत्तम होता है ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन भगवान् रूद्र अर्थात शिव का रुद्री पाठ द्वारा अभिषेक करना बहुत फलदायी होता है |
  • अगर कोई व्यक्ति सोमवती अमावस्या के दिन काली मिर्च और जटामासी के द्वारा हवन करते है तो उनके काल सर्प दोष में शांति होती है और सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलते है ।

2.भाग्योदय के लिए उपाय :

  • भाग्योदय के लिए सोमवती अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष का रोपण एवं उसका पालन पोषण करने से जन्म-जन्मांत के पाप नष्ट हो जाते है और जैसे-जैसे वृक्ष की वृद्धि होती है,वैसे-वैसे उस व्यक्ति का भाग्योदय होता है।
  • सोमवती अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष की परिक्रमा एवं षोड़ोपचार द्वारा पूजा करने का विधान है और साथ ही पीपल को भगवान् श्रीहरी मान कर अपने किये हुए गलती के लिए क्षमा मांगनी चाहिए और साथ अपनी तरक्की के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए  |
  • सोमवती अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के समीप अखंड दीप-दान का विशेष महत्व है। यह छोटा सा उपाय जीवन में आने वाली संकटो से निवारण करता है ।

3.अखंड सौभाग्य हेतु उपाय :

  • विशेष करके सोमवती अमावस्या के दिन सुहागिन धोबन को सुहाग की सामग्री एवं वस्त्र दक्षिणा सहित देने का विशेष महत्त्व है । अगर संभव हो सके तो भोजन इत्यादि भी करा सकते है अन्यथा भोजन का सामान भी वस्त्र इत्यादि के सहित भी दे सकते है ।
  • जिनकी भी लड़की की नई शादी हुई तो उन को विशेष करके किसी भी सुहागन धोबन से अपनी मांग भर वानी  चाहिये और उसको भेंट स्वरूप जो संभव हो सके दान- दक्षिणा देनी चाहिये.

4. राशि अनुसार उपाय :

  • मेष राशि : गायत्री मंत्रो द्वारा हवन और साथ भगवान् शिव की आराधना करनी चाहिए ।
  • वृष राशि :भगवान् विष्णु की आराधना करनी चाहिए और साथ ही किसी कुएं में दूध डाल दे, लाभ होगा ।
  • मिथुन राशि: भगवान् शिव पर नारियल चढ़ाना चाहिए और गणेशजी और तुलसीजी की आराधना लाभकारी ।
  • कर्क राशि :भगवान् शिव को खीर का भोग और रुद्री पाठ द्वारा अभिषेक लाभकारी सिद्ध और चन्द्रमा को रात्रि में दीप दान ।
  • सिंह राशि:भगवान् सूर्य की उपासना उत्तम है । भगवान् सूर्य को ताम्बे के पात्र में रोली और लाल पुष्प मिला कर , गायत्री मंत्र जप करते हुए अर्घ प्रदान करे ।
  • कन्या राशि:भगवान् शिव पर नारियल चढ़ाना चाहिए और गणेशजी और तुलसीजी की आराधना लाभकारी ।
  • तुला राशि: विशेष करके पीपल वृक्ष की पूजा और सेवा लाभकर सिद्ध ।
  • वृश्चिक राशि: बहते हुए नदी में पुष्प सहित दीप दान उत्तम और गायत्री मंत्रो द्वारा हवन और साथ भगवान् शिव की आराधना करनी चाहिए ।
  • धनु राशि :भगवान् शिव के निकट संध्या के समय दीप दान विशेष लाभकारी ।
  • मकर राशि: मकर राशि के लोगो को अपने ऊपर से नीम्बू उसार के चौराहे पर फेकना है और साथ भगवान् शिव की पंचामृत द्वारा पूजन ।
  • कुम्भ राशि : विशेष करके पीपल वृक्ष की पूजा और सेवा लाभकर सिद्धऔर साथ काले कुत्ते को तेल से बने पकवान खिलाने चाहिए ।
  • मीन राशि : भगवान् विष्णु की आराधना करनी चाहिए और साथ ही विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ लाभ देगा |

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