श्री भैरवी तंत्र अंतर्गत- श्री श्री महाविद्या महास्रोतम (सप्रयोग)

श्री श्री महाविद्यास्तोत्रम्-सप्रयोग

महादेव के समीप में इस महाविद्यास्तोत्र के इक्कीस बार पाठ करने से सिद्धि प्राप्त होती है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । दुष्टों का मारण तथा सब ग्रहों की शान्ति भी होती है और सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है । विशेष करके प्रेत बाधा की शान्ति निश्चित रूप से होती है ॥

  • सर्वप्रथम  श्री महाविद्या स्रोत के पाठ से पूर्व श्री महाविद्या कवच का पथ अवश्य करे !
  • अथाऽस्य स्तोत्रस्योत्कीलनमन्त्रः – इस स्तोत्र का उत्कीलन मन्त्र है – ॐ उग्रं वीरं से – नमाम्यहम् तक । इस मन्त्र का 108 आदि और अंत में जाप करना है  :  ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

महाविद्यां प्रवक्ष्यामि महादेवेन निर्मिताम् । उत्तमां सर्वविद्यानां सर्वभूताघशङ्करीम् ॥

भगवान् शङ्कर द्वारा निर्मित उस महाविद्या को मैं कहता हूं, जो सब विद्याओं में श्रेष्ठ तथा सब जीवों को वश में करनेवाली हैं ।

 

सर्वप्रथम पाठकर्ता दाहिने हाथ में पुष्प, अक्षत, जल लेकर  सङ्कल्पः करे –

ॐ तत्सदद्याऽमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रः – अमुकशर्माऽहं मम (अथवाऽमुकयजमानस्य) गृहे उत्पन्न भूत-प्रेत-पिशाचादि-सकलदोषशमनार्थं  झटित्यारोग्यताप्राप्त्यर्थं च महाविद्यास्तोत्रस्य पाठं करिष्ये ।

ततपश्चात् ॐ अस्य श्रीमहाविद्यास्तोत्रमन्त्रस्य – से विनियोगः तक पढकर भूमि पर जल छोड दे ।

विनियोगः – ॐ अस्य श्रीमहाविद्यास्तोत्रमन्त्रस्याऽर्यमा ऋषिः, कालिका देवता, गायत्री छन्दः, श्रीसदाशिवदेवताप्रीत्यर्थे मनोवाञ्छितसिद्ध्यर्थे च जपे (पाठे) विनियोगः ।

ध्यानम्
उद्यच्छीतांशु-रश्मि-द्युतिचय-सदृशीं फुल्लपद्मोपविष्टां
वीणा-नागेन्द्र-शङ्खायुध-परशुधरां दोर्भिरीड्यैश्चतुर्भिः ।
मुक्ताहारांशु-नानामणियुतहृदयां सीधुपात्रं वहन्तीं
वन्देऽभीज्यां भवानीं प्रहसितवदनां साधकेष्टप्रदात्रीम् ॥

 

उसके बाद उद्यच्छीतांशु से साधकेष्टप्रदात्रीं तक श्लोक पढकर महाविद्या का ध्यान कर, ॐ कुलकरीं गोत्रकरीं से आरम्भ कर, प्रेतशान्तिर्विशेषतः तक स्तोत्र का पाठ करे ।

अथ स्त्रोत

ॐ कुलकरीं गोत्रकरीं धनकरीं पुष्टिकरीं वृद्धिकरीं हलाकरीं सर्वशत्रुक्षयकरीं उत्साहकरीं बलवर्धिनीं सर्ववज्रकायाचितां सर्वग्रहोत्पाटिनीं पुत्र-पौत्राभिवर्द्धिनीमायुरारोग्यैश्वर्याभिवर्द्धिनीं ,सर्वभूतस्तम्भिनीं द्राविणीं मोहिनीं सर्वाकर्षिणीं सर्वलोकवशङ्करीं सर्वराजवश्ङ्करीं सर्वयन्त्र-मन्त्र-प्रभेदिनीमेकाहिकं द्व्याहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं पाञ्चाहिकं साप्ताहिकमार्द्धमासिकं मासिकं चातुर्मासिकं षाण्मासिकं सांवत्सरिकं वैजयन्तिकं पैत्तिकं वातिकं श्लैष्मिकं सान्निपातिकं कुष्ठरोगजठररोगमुखरोगगण्डरोगप्रमेहरोगशुल्काविशिक्षयकरीं विस्फोटकादिविनाशनाय स्वाहा ।

ॐ वेतालादिज्वर-रात्रिज्वर-दिवसज्वराग्निज्वर-प्रत्यग्निज्वर-राक्षसज्वर-पिशाचज्वर-ब्रह्मराक्षसज्वर-प्रस्वेदज्वर-विषमज्वर-त्रिपुरज्वर-मायाज्वर-आभिचारिकज्वर-वष्टिअज्वर-स्मरादिज्वर-दृष्टिज्वर-प्रोगादि विनाशनाय स्वाहा । सर्वव्याधि विनाशनाय स्वाहा । सर्वशत्रु विनाशनाय स्वाहा ।

ॐ अक्षिशूल-कुक्षिशूल-कर्णशूल-घ्राणशूलोदरशूल-गलशूल-गण्डशूल-पादशूल-पादार्धशूल-सर्वशूलविनाशनाय स्वाहा ।

ॐ सर्वशत्रुविनाशनाय स्वाहा । सर्वस्फोटक-सर्वक्लेशविनाशनाय स्वाहा ।

ॐ आत्मरक्षा ॐ परमात्मरक्षा मित्ररक्षा अग्निरक्षा प्रत्यग्निरक्षा परगतिवातोरक्षा तेषां सकलबन्धाय स्वाहा । ॐ हरदेहिनी स्वाहा । ॐ इन्द्रदेहिनी स्वाहा । ॐ स्वस्य ब्रह्मदण्डं विश्रामय । ॐ विश्रामय विष्णुदण्डम् । ॐ ज्वर-ज्वरेश्वर-कुमारदण्डम् । ॐ हिलि मिलि मायादण्डम् । ॐ नित्यं नित्यं विश्रामय -विश्रामय वारुणी शूलिनी गारुडी रक्षा स्वाहा ।

गंगादिपुलिने जाता पर्वते च वनान्तरे । रुद्रस्य हृदये जाता विद्याऽहं कामरूपिणी ॥

ॐ ज्वल ज्वल देहस्य देहेन सकललोहपिङ्गिलि कटि मपुरी किलि किलि किलि महादण्ड कुमारदण्ड नृत्य नृत्य विष्णुवन्दितहंसिनी शङ्खिनी चक्रिणी गदिनी शूलिनी रक्ष रक्ष स्वाहा ।

अथ बीजमन्त्राः

ॐ ह्राँ स्वाहा । ॐ ह्राँ ह्राँ स्वाहा ।
ॐ ह्रीँ स्वाहा । ॐ ह्रीँ ह्रीँ स्वाहा ।
ॐ ह्रूँ स्वाहा । ॐ ह्रूँ ह्रूँ स्वाहा ।
ॐ ह्रेँ स्वाहा । ॐ ह्रेँ ह्रेँ स्वाहा ।
ॐ ह्रैँ स्वाहा । ॐ ह्रैँ ह्रैँ स्वाहा ।
ॐ ह्रोँ स्वाहा । ॐ ह्रोँ ह्रोँ स्वाहा ।
ॐ ह्रौँ स्वाहा । ॐ ह्रौँ ह्रौँ स्वाहा ।
ॐ ह्रँ स्वाहा । ॐ ह्रँ ह्रँ स्वाहा ।
ॐ ह्रः स्वाहा । ॐ ह्रः ह्रः स्वाहा ।
ॐ क्राँ स्वाहा । ॐ क्राँ क्राँ स्वाहा ।
ॐ क्रीँ स्वाहा । ॐ क्रीँ क्रीँ स्वाहा ।
ॐ क्रूँ स्वाहा । ॐ क्रूँ क्रूँ स्वाहा ।
ॐ क्रेँ स्वाहा । ॐ क्रेँ क्रेँ स्वाहा ।
ॐ क्रैँ स्वाहा । ॐ क्रैँ क्रैँ स्वाहा ।
ॐ क्रोँ स्वाहा । ॐ क्रोँ क्रोँ स्वाहा ।
ॐ क्रौँ स्वाहा । ॐ क्रौँ क्रौँ स्वाहा ।
ॐ क्रँ स्वाहा । ॐ क्रँ क्रँ स्वाहा ।
ॐ क्रः स्वाहा । ॐ क्रः क्रः स्वाहा ।
ॐ कँ स्वाहा । ॐ कँ कँ स्वाहा ।
ॐ खँ स्वाहा । ॐ खँ खँ स्वाहा ।
ॐ गँ स्वाहा । ॐ गँ गँ स्वाहा ।
ॐ घँ स्वाहा । ॐ घँ घँ स्वाहा ।
ॐ ङँ स्वाहा । ॐ ङँ ङँ स्वाहा ।
ॐ चँ स्वाहा । ॐ चँ चँ स्वाहा ।
ॐ छँ स्वाहा । ॐ छँ छँ स्वाहा ।
ॐ जँ स्वाहा । ॐ जँ जँ स्वाहा ।
ॐ झँ स्वाहा । ॐ झँ झँ स्वाहा ।
ॐ ञँ स्वाहा । ॐ ञँ ञँ स्वाहा ।
ॐ टँ स्वाहा । ॐ टँ टँ स्वाहा ।
ॐ ठँ स्वाहा । ॐ ठँ ठँ स्वाहा ।
ॐ डँ स्वाहा । ॐ डँ डँ स्वाहा ।
ॐ ढँ स्वाहा । ॐ ढँ ढँ स्वाहा ।
ॐ णँ स्वाहा । ॐ णँ णँ स्वाहा ।
ॐ तँ स्वाहा । ॐ तँ तँ स्वाहा ।
ॐ थँ स्वाहा । ॐ थँ थँ स्वाहा ।
ॐ दँ स्वाहा । ॐ दँ दँ स्वाहा ।
ॐ धँ स्वाहा । ॐ धँ धँ स्वाहा ।
ॐ नँ स्वाहा । ॐ नँ नँ स्वाहा ।
ॐ पँ स्वाहा । ॐ पँ पँ स्वाहा ।
ॐ फँ स्वाहा । ॐ फँ फँ स्वाहा ।
ॐ बँ स्वाहा । ॐ बँ बँ स्वाहा ।
ॐ भँ स्वाहा । ॐ भँ भँ स्वाहा ।
ॐ मँ स्वाहा । ॐ मँ मँ स्वाहा ।
ॐ यँ स्वाहा । ॐ यँ यँ स्वाहा ।
ॐ रँ स्वाहा । ॐ रँ रँ स्वाहा ।
ॐ लँ स्वाहा । ॐ लँ लँ स्वाहा ।
ॐ वँ स्वाहा । ॐ वँ वँ स्वाहा ।
ॐ शँ स्वाहा । ॐ शँ शँ स्वाहा ।
ॐ षँ स्वाहा । ॐ षँ षँ स्वाहा ।
ॐ सँ स्वाहा । ॐ सँ सँ स्वाहा ।
ॐ हँ स्वाहा । ॐ हँ हँ स्वाहा ।
ॐ क्षँ स्वाहा । ॐ क्षँ क्षँ स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ लेषाय स्वाहा । ॐ गणेश्वराय स्वाहा ।
ॐ दुर्गे महाशक्तिक-भूत-प्रेत-पिशाच-राक्षस-ब्रह्मराक्षस- सर्ववेताल-वृश्चिकादिभयविनाशनाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।

ॐ ब्रं ब्रह्मणे स्वाहा । ॐ विं विष्णवे स्वाहा । ॐ शिं शिवाय स्वाहा ।

ॐ सूं सूर्याय स्वाहा । ॐ सों सोमाय स्वाहा । ॐ विं विष्णवे स्वाहा । ॐ शिं शिवाय स्वाहा ।
ॐ सूं सूर्याय स्वाहा । ॐ सों सोमाय स्वाहा ।
ॐ मं मंगलाय स्वाहा । ॐ बुं बुधाय स्वाहा ।
ॐ बृं बृहस्पतये स्वाहा । ॐ शुं शुक्राय स्वाहा ।
ॐ शं शनैश्चराय स्वाहा । ॐ रां राहवे स्वाहा ।
ॐ कें केतवे स्वाहा ।

ॐ महाशान्तिक-भूत प्रेत-पिशाच-राक्षस- ब्रह्मराक्षस-वेताल-वृश्चिकभयविनाशनाय स्वाहा ।
ॐ सिंह-शार्दूल-गजेन्द्र-ग्राह-व्याघ्रादिमृगान् बध्नामि स्वाहा ।
ॐ शस्त्रं बध्नामि स्वाहा । ॐ अस्त्रं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ आशां बध्नामि स्वाहा । ॐ सर्वं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ सर्वजन्तून् बध्नामि स्वाहा । ॐ बन्ध बन्ध मोचनं कुरु कुरु स्वाहा ।

दिग्बन्धनम्

ॐ नमो भगवते रुद्राय महेन्द्रदिशायामैरावतारूढं हेमवर्णं वज्रहस्तं परिवारसहितं इन्द्रदेवताधिपतिमैन्द्रमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ ऐन्द्रमण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्निदिशायां मार्जारारूढं शक्तिहस्तं परिवारसहितं  दिग्देवताधिपतिमग्निमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अग्निमण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।
ॐ नमो भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै नमः स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते रुद्राय दक्षिण दिशायां महिषारूढं कृष्णवर्णं दण्डहस्तं परिवारसहितं दिग्देवताधिपतिं यममण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ यम मण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।
ॐ नमो भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै नमः स्वाहा ।

ॐ नैरृत्यदिशायां प्रेतारूढं खड्गहस्तं परिवारसहितं दिग्देवताधिपतिं नैरृत्यमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ नैरृत्य मण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः स्वाहा । ॐ क्रां क्रीं क्रूं क्रैं क्रौं क्रः स्वाहा ।

ॐ पश्चिम दिशायां मकरारूढं पाशहस्तं परिवारसहितं दिग्देवताधिपतिं वरुणमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै नमः स्वाहा ।
ॐ वरुण मण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।

ॐ वायव्यदिशायां मृगारूढं धनुर्हस्तं परिवारसहितं दिग्देवताधिपतिं वायव्यमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै नमः स्वाहा ।
ॐ वायव्यमण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।

ॐ उत्तरदिशायां यक्षारुढं मदाहस्तं परिवारसहितं दिग्देवताधिपतिं कुबेरमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै नमः स्वाहा ।
ॐ कुबेर मण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा ।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।

ॐ अग्निदिशायां कूर्मारूढं लोष्ठभागं परिख हस्तं कुपरिखा स्वपरिवारसहितं दिग्देवताधिपतिं पातालमण्डलं बध्नामि स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ भैरवाय स्वाहा ।
ॐ गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै नमः स्वाहा ।
ॐ पातालमण्डलं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष माचल माचल माक्रम्य माक्रम्य स्वाहा।
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ ह्रौँ ह्रः स्वाहा । ॐ क्राँ क्रीँ क्रूँ क्रैँ क्रौँ क्रः स्वाहा ।

ॐ दुर्गे महाशान्तिक-भूत-प्रेत-पिशाच-राक्षस-ब्रह्मराक्षस-वेताल-वृश्चिकादि भयविनाशनाय स्वाहा ।

ॐ पूर्वदिशायां व्रजको नाम राक्षसस्तस्य व्रजकस्याष्टादशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ अग्निदिशायामग्निज्वालो नाम राक्षसस्तस्याग्निज्वालस्या-अष्टादशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां वध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ दक्षिणदिशायामेकपिङ्गलिको नाम राक्षसस्तस्यैकपिङ्गलिकस्याष्टा-दशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ नैरृत्यदिशायां मरीचिको नाम राक्षसस्तस्य मरीचिकस्याष्टादशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ पश्चिमदिशायां मकरो नाम राक्षसस्तस्य मकरस्याष्टादशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ वायव्यदिशायां तक्षको नाम राक्षसस्तस्य तक्षकस्याष्टादशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ उत्तरदिशायां महाभीमो नाम राक्षसस्तस्य भीमस्याष्टादसकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ ईशानदिशायां भैरवो नाम राक्षसस्तस्या-अष्टादश कोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।
ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा ।

ॐ अधः दिशायां पातालनिवासिनो नाम राक्षसस्तस्या-अष्टादश कोटिसहस्रस्य तस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा ।

ॐ ब्रह्मदिशायां ब्रह्मरूपो नाम राक्षसस्तस्य ब्रह्मरूपस्याष्टादशकोटिसहस्रस्य पिशाचस्य दिशां बध्नामि स्वाहा । ॐ अस्त्राय फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा । ॐ नमो भगवते भैरवाय स्वाहा । ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा । ॐ नमो दुर्गायै स्वाहा ।

ॐ नमो महाशान्तिक-भूत-प्रेत-पिशाच-राक्षस-ब्रह्मराक्षस-वेताल-वृश्चिकभयविनाशनाय स्वाहा ।

ॐ शिखायां मे क्लीं ब्रह्माणी रक्षतु । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ शिरो मे रक्षतु माहेश्वरी । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ भुजौ रक्षतु सर्वाणी । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ उदरे रक्षतु रुद्राणी । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ जङ्घे रक्षतु नारसिंही । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ पादौ रक्षतु महालक्ष्मी । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ सर्वाङ्गे रक्षतु सुन्दरी । ॐ ह्रां ह्रीं व्रीं व्लीं क्षौं हुं फट् स्वाहा ।

परिणामे महाविद्या महादेवस्य सन्निधौ । एकविंशतिवारं च पठित्वा सिद्धिमाप्नुयात् ॥ १॥

स्त्रियो वा पुरुषो वापि पापं भस्म समाचरेत् । दुष्टानां मारणं चैव सर्वग्रहनिवारणम् । सर्वकार्येषु सिद्धिः स्यात् प्रेतशान्तिर्विशेषतः ॥

।। इति श्री भैरवी तन्त्रे शिव प्रोक्ता महाविद्या समाप्त ।

Note:
इस स्तोत्र का उत्कीलन मन्त्र है – ॐ उग्रं वीरं से – नमाम्यहम् तक ।

अष्टोत्तरशतमभिमन्त्र्य जलं पाययेत् अथवा कुशैर्मार्जयेत् : इस मन्त्र से एकसौ आठ बार जल को अभिमन्त्रित कर पिलाना चाहिये अथवा कुश से मार्जन करे ।

ध्यान रखे की इस श्री महाविद्या स्रोत के पाठ से पूर्व श्री महाविद्या कवच का पथ अवश्य करे ! उसके बिना पाठ करना हानिकारक सिद्ध हो सकता है और साथ अपने गुरु से आज्ञा तथा उनकी निर्देश अनुसार ही इस पाठ विशेष अनुष्ठान करे !

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