॥ श्रीरुद्रयामले अंतर्ग़ते सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

श्रीरुद्रयामले अंतर्ग़ते सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

सिद्ध-कुञ्जिकास्तोत्र एक अत्यन्त रहस्यमय तथा क्षिप्रफल प्रदान करने वाला स्तोत्रराज हैं। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ अद्भुत और परम कल्याणकारी स्तोत्र है। इस परम कल्याणकारी सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का अनुष्ठान या नियमित पाठ करने वाले साधक को दशों महाविद्या तथा नौ देवियों की कृपा और आशीर्वाद स्वत: प्राप्त हो जाती है।

इस स्तोत्र का पाठ मनुष्य के जीवन में आ रही समस्या और विघ्नों को दूर करने वाला है। मां दुर्गा के इस पाठ का जो मनुष्य विषम परिस्थितियों में वाचन करता है उसके समस्त कष्टों का अंत होता है। इस स्तोत्र का पाठ बालकों की भूतादिग्रहपीड़ा में भी लाभदायक हैं । इसके नियमित रूप से पाठ से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति हो जाती है.

वे साधक जो पूर्ण श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ करने में असमर्थ है मात्र सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के पाठ से ही दुर्गापाठ के पूर्ण फल का लाभ उठा सकते हैं ।  जैसा कि सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र की पूर्वपीठीका में उल्लिखित है- “कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌ ॥”

जो साधक श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ के पूर्व इस स्तोत्र का पाठ नहीं करता उसे अभीष्टफल की प्राप्ति नहीं होती हैं। उसका पाठ जंगल में रोने के सामन होता हैं। “कुंजिका रहितां देवी यस्तु सप्तशतीं पठेत्‌। न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥”

जैसा कि सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र की फलस्तुति में उल्लिखित है “इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ॥” अर्थात यह सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र श्रीदुर्गासप्तशती तथा नवार्णमन्त्र की जागृति के हेतु हैं ।

साथ ही साधक इस स्तोत्र के पाठ से षट्कर्मो मे भी सफलता प्राप्त कर सकता हैं। “मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌। पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥”

अब प्रश्न यह उठता है कि इस स्तोत्र का नाम सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र ही क्यों हैं। इसका उत्तर हैं पूर्व काल में भगवान शिव तथा ऋषियों ने कलिकाल के आगमन पर श्रीदुर्गासप्तशती तथा नवार्णमन्त्र को किलित कर दिया अर्थात ताला/कील लगाकर निष्प्रभावी कर दिया तथा उसकी चाबी, जिसे संस्कृत में कुंजी कहते हैं इस स्तोत्र में गोपित कर दी इसी कारण इस स्तोत्र को सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र कहा जाता हैं।

कैसे करें
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अत्यंत सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। प्रतिदिन की पूजा में इसको शामिल कर सकते हैं। लेकिन यदि अनुष्ठान के रूप में या किसी इच्छाप्राप्ति के लिए कर रहे हैं तो आपको कुछ सावधानी रखनी होंगी।
1. संकल्प: सिद्ध कुंजिका पढ़ने से पहले हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें। मन ही मन देवी मां को अपनी इच्छा कहें।
2. जितने पाठ एक साथ ( 1, 2, 3, 5. 7. 11) कर सकें, उसका संकल्प करें। अनुष्ठान के दौरान माला समान रखें। कभी एक कभी दो कभी तीन न रखें।
3. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के अनुष्ठान के दौरान जमीन पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
4. प्रतिदिन अनार का भोग लगाएं। लाल पुष्प देवी भगवती को अर्पित करें।

 

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् (संपूर्ण शास्त्रोक्त विधि)

श्री गणेशाय नमः ।

पुजन विधान

१. लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन पर बैठे और अपना मुख उत्तर की ओर और यंत्र के साथ देवी की फोटो पाटे पर स्थापित करें……. देवी का मुख पूर्व दिशा की ओर हो……..

२. फिर एक लाल फूल एवं अक्षत लेकर वंदना करते हुए अर्पित करें…….

ऊँगं गणेशाय नमः l

ऊँ गुं गुरुभ्यो नमः l

ऊँ महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवताभ्यो नमः l

३.फिर गुरु स्तुति करें……..
अखंड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् l तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः l

 ४. फिर निम्न मंत्रों से भस्म या रोली को जल में घोलकर मस्तक पर लगाये…….
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्द्धनम् l उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात l

फिर गले में रुद्राक्ष की माला गले में धारण करें

 ५. फिर निम्न मंत्रों से आचमन करें……

ऐं ह्रीं क्लीं आत्मतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
ऐं ह्रीं क्लीं विद्यातत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
ऐं ह्रीं क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l

 ६. फिर शिखा बंधन , प्राणायाम करें……. दीप प्रज्वलित करे

७. फिर संकल्प करे …… हाथ में जल लेकर ये संकल्प मंत्र बोलकर

“अद्येत्यादि ममाशेष दुरित क्षयपूर्व कर्मभीष्ट फल प्राप्तयर्थं श्री सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र मंत्र महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः प्रीतये साधनां करिष्ये ” 

यंत्र  या श्री विग्रह के सामने जल गिरा दें………. इसके बाद 3 बार सिर के ऊपर जल छिड़के

८ . फिर बायें पाँव को ३ बार पटकते हुए

“ऊँ श्लीं पशु हुं फट् ” का वाचन करें!

शापोद्धार मन्त्र : इस मन्त्र का आदि और अन्त में सात बार जप करे।

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।

उत्कीलन मन्त्र: इस मन्त्र का जप आदि और अन्त में सौ सौ बार जपना होता है।

” ॐ ऐं क्रीं चामुण्डे सर्व मंत्र पाठ उत्कीलम कुरु कुरु क्रीं फट्ट

मृतसंजीवनी विद्या मन्त्र: इस मन्त्र का जप आदि और अन्त में सात-सात बार जपना चाहिये।

“ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।”

चण्डिका शाप विमोचन मंत्र

“ऊँ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचन मन्त्रस्य वसिष्ठनारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषय: सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्रीं शक्ति: त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तो मम संकल्पितकार्यसिद्धयर्थे जपे विनियोग:।”

शापविमोचन मंत्र

ॐ (ह्रीं) रीं रेत:स्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१॥

ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै,ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥२॥

ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥३॥

ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥४॥

ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥५॥

ॐ तं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥६॥

ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥७॥

ॐ जां जातिरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥८॥

ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥९॥

ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१०॥

ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफ़लदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥११॥

ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१२॥

ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१३॥

ॐ माँ मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमासहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१४॥

ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१५॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नम: शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१६॥

ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फ़ट स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१७॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नम:॥१८॥

इत्येवं हि महामन्त्रान पठित्वा परमेश्वर,चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशय:॥१९॥

एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति य:,आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशय:॥२०॥

मानस-पूजनः

ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्वकं गन्धं  समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश तत्त्वात्वकं पुष्पं समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु तत्त्वात्वकं धूपं घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि तत्त्वात्वकं दीपं दर्शयामि नमः।
ॐ वं जल तत्त्वात्वकं नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्वकं ताम्बूलं समर्पयामि नमः।

ध्यान मंत्र:

ॐ या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी माहिषोन्मादिनी या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी ।

शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिलक्ष्मीः परा सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ॥

ॐ अम्बेऽअम्बिकेऽम्बालिके न मा नयतिकश्चन । ससस्त्यश्वक:सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासिनीम् ॥

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भदायै नियता: प्रणता: स्मताम्।।

विनियोगः 

ॐ अस्य श्रीकुञ्जिकास्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्,
मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ऋष्यादि न्यास:

ॐ सदाशिव ऋषिः शिरसे नमः

ॐ अनुष्टुप् छन्दः मुखे

ॐ श्रीत्रिगुणात्मिका देवता  हृदयाय नमः

ॐ ऐं बीजं गुह्य

ॐ ह्रीं शक्तिः पादयो

ॐ क्लीं कीलकम्

कर-न्यासः

ॐ ऐं        अंगुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ ह्रीं        तर्जनीभ्यां स्वाहा।

ॐ क्लीं     मध्यमाभ्यां वषट्।

ॐ ऐं        अनामिकाभ्यां हुं।

ॐ ह्रीं       कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्।

ॐ क्लीं     कर-तल-करपृष्ठाभ्यां फट्।

अंग-न्यासः-
ॐ ऐं                हृदयाय नमः।

ॐ ह्रीं               शिरसे स्वाहा।

ॐ क्लीं             शिखायै वषट्।

ॐ ऐं                 कवचाय हुं।

ॐ ह्रीं                नेत्र-त्रयाय वौषट्।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं     अस्त्राय फट्।

दिग्बन्धन :- “ऐं ह्रीं क्लीं  या भूर्भुव: स्वरोम ”

(चुटकी बजाते हुए अपने चारो ओर की दिशा का दिग्बन्धन कर ले )

शिव उवाच ।

श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥ १॥

 न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥ २॥

 कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३॥

 गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।

पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥ ४॥

 ।अथ मन्त्रः ।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।

ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ ५॥

इति मंत्रः ।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।

नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन।।1।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनी

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे। ।।2।।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते। ।।3।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणी  ।।4।।

धां धीं धू धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु  ।।5।।

हुं हुं  हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ।।6।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।।7।।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा

म्लां म्लीं म्लूं मूलविस्तीर्णा कुञ्जिकायै नमो नमः ।। 8।।

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे।।

इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे। ।। 9।।

 फल श्रुति

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति।।

यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।

 

।इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्।

 

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का उत्तम पुरश्चरण १००८ बार पाठ करके, मध्यमपुरश्चरण ५५५ बार पाठ करके तथा साधारण पुरश्चरण १०८ पाठ करके संपादित किया जा सकता हैं । साधक यदि समर्थ होवे तो पंचांग पुरश्चरण करें अन्यथा पाठमात्र करें…… अस्तु ।

ऊपर बताइये हुई विधि पूर्ण तौर पर शास्त्रोक्त तथा बड़े-बड़े विद्ववानों द्वारा सर्वसम्मत है,अगर कोई व्यक्ति या साधक सिद्ध कुंजिका का पाठ उक्त विधि से करता है तो अपने मनोरथ को पूर्ण तौर पर प्राप्त कर लेता है , इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।

हमारे यहाँ पर प्रस्तुत सिद्ध कुंजिका का पाठ शुद्ध तथा पूर्ण रूप में वर्णित है , क्यूंकि आम तौर पर बाज़ारो में प्राप्त होने वाली किताबो में पूर्ण रूप से वर्णित नहीं किया गया है कारण कुछ भी हो सकता है ।

सिद्ध कुंजिका की सबसे महत्वपूर्ण लाइन या मंत्र जो की आम तौर पर पायी जाने वाली किताबो में आप को नहीं मिलेगी वो है  “म्लां म्लीं म्लूं मूल विस्तीर्णा कुञ्जिकायै नमो नमः ” इसके बिना सिद्ध कुंजिका का पाठ अधूरा या पूर्ण रूप फल देने में असमर्थ होता है ।

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