शिव पुराण के श्रवण मात्र से शिवलोक कि प्राप्ति – पौराणिक इतिहास

शिव पुराण के केवल श्रवण से शिवलोक प्राप्ति

सबसे आसान है शिव को प्रसन्न करना शिव-पुराण कथा के अनुसार शिव ही ऐसे भगवान हैं, जो शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वर दे देते हैं। वे सिर्फ शिवलिंग की महिमा बताते हुए कहा कि शिवलिंग में मात्र जल चढ़ाकर या बेलपत्र अर्पित करके भी शिव को प्रसन्न किया जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष पूजन विधि की आवश्यकता नहीं है। अपने भक्तों का कल्याण करना चाहते हैं। वे यह नहीं देखते कि उनकी भक्ति करने वाला इंसान है, राक्षस है, भूत-प्रेत है या फिर किसी और योनि का जीव है

श्रीशौनक जी ने कहा – महाभाग सूतजी ! आप धन्य है , परमार्थ तत्व के ज्ञाता है , आपने कृपा करके हमलोगो को यह दिव्य कथा सुनाई है | भूतल पर इस कथा के समान कल्याण का सर्वश्रेष्ठ साधन दूसरा कोई नहीं है ,यह बात आज हमने आपकी कृपा से निश्चय पूर्वक समाज ली | सूतजी ! कलयुग में इन कथाओ के द्वारा कौन कौन से पापी शुद्ध होते है ? उन्हें कृपा पूर्वक बताइये और इस जगत को कृतार्थ कीजिये |

अब सूत जी बोलते है – मुने ! जो मनुष्य पापी , दुराचारी , खल तथा काम क्रोध आदि में निरंतर लिप्त रहले वाले है , वो भी इस पुराण के श्रवण पाठन से शुद्ध हो जाते है | इसी विषय में जानकर मुनि इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते है , जिसके श्रवण मात्र से सम्पूर्ण पापो का नाश हो जाता है |

पहले की बात है , कही किरातो के नगर मे एक ब्रामण रहता था , जो ज्ञान मे अत्यन्त दुर्बल, दरिद्र, रस बेचनेवाला तथा वैदिक धर्म से विमुख था । वह स्नान सन्धया आदि कर्मो से भ्रष्ट हो गया था एवं वैश्या वृति में तत्पर रहता था | उसका नाम था देवराज | वह अपने ऊपर विस्वास करनेवाले लोगो को ठगा करता था | उसने ब्राह्मणो , क्षत्रियो , वैश्यों , छुद्र तथा दुसरो को भी अपने बहानो से मारकर उन सबका धन हडप लिया था । परन्तु उस पापी का थोडा सा भी धन धर्म के काम मे नही लगा । वह वेश्यागामी तथा सब प्रकार से आचारभ्रष्ट था ।
एक दिन वह घुमता घामता प्रतिष्ठानपुर (झुसी – प्रयाग ) मे जा पहुचा । वहॉ उसने एक शिवालय देखा , जहा बहुत से साधू महात्मा एकत्र हुए थे । देवराज उस शिवालय मे ठहर गया , किन्तु वहॉ उसे ज्वर आ गया । उस ज्वर से उसको बहुत पिडा होने लगी । वहा एक ब्राह्रण देवता शिव पुराण कि कथा सुना रहे थे । ज्वर मे पडा हुआ देवराज ब्राह्रण के मुखारविन्द से निकली हुइ उस शिव कथा को निरंतर सुनता रहा । एक मास के बाद वह ज्वर से अत्यन्त पिडित होकर चल बसा । यमराज के दुत आये और उसे पाशो मे बांध कर बलपुर्वक यमपुरी ले गये । इतने मे हि शिव लोक से भगवान शिव के पार्षदगण आ गये । उनके गौर अंग कर्पुर के समान उज्जवल थे , हाथ त्रिशूल से सुशोभित हो रहे थे ,उनके सम्पूर्ण अंग भस्म से चमक रहे थे और रुद्राक्ष की मालाएँ उनके शरीर की शोभा बढ़ा रही थी | वे सब के सब क्रोध पूर्वक यमपुरी गए और यमराज के दूतो को मारपीट कर बारम्बार धमकाकर उन्होंने देवराज को उनके चंगुल से छुड़ा लिया और अत्यंत अद्भुत बिमान पर बैठा कर जब वे शिव दूत कैलास जाने को उद्धत हुए , उस समय यमपुरी में भारी कोलाहल मच गया उस कोलाहल को सुनकर धर्मराज अपने भवन से बाहर आये | साक्षात दूसरे रुद्रो के समान प्रतीत होनेवाले उन चारो दूतो को देखकर धर्मज्ञ धर्मराज उनका विधिपूर्वक पूजन किया और और ज्ञान दृष्टि से देख कर सारा वृतांत जान लिया | उन्होंने भय के कारण भगवान शिव के उन महात्मा दूतो से कोई बात नहीं पूछी , उलटे उन सब की पूजा एवं प्रार्थना की | तत्पश्चात वे शिव दूत कैलाश को चले गए और वहां पहुंचकर उन्होंने उस ब्राह्मण को दयासागर साम्ब शिव के हाथ में दे दिया |

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