शिव पंचाक्षरी मंत्र साधना – सर्व मनोकामना प्रदत्त

“नमः शिवाय”

‘नमः शिवाय’ मंत्र बहुत ही सीधा, सरल एवं सर्वगम्य यह मंत्र तेजस्वी एवं अत्यधिक प्रभावयुक्त क्रम में है | यह पंचाक्षर मंत्र अल्पाक्षर होते हुए भी अपने गहनतम अर्थों को समाहित किए हुए हैं| जो जन्म-मृत्यु से रहित है जिसका कभी भी क्षय नहीं होता, सभी देव जिसे नमन करते हैं | गहनतम ध्यान में मग्न सभी पापों को हरण करने वाले, जिससे परे और कुछ भी नहीं है, सभी शास्त्रों का एक मात्र विषय, सर्वाभूषण, नीलकंठ जो सर्वत्र व्याप्त हैं, जो सर्वगुरु हैं वह शिव हैं | भगवान शंकर को प्रसन्न करने का यह पंचाक्षर मंत्र उत्तम साधन बताया गया है| इस प्रकार ‘नम शिवाय’ इस पंचाक्षर मंत्र की साधना प्रत्येक मनुष्य को यथानुकूल करनी ही चाहिए | पंचाक्षर मंत्र की सिद्धता के बाद और किसी मंत्र या साधना की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती, क्योंकि शिव ही साक्षात परब्रह्म हैं, वही परमानंद हैं, वही ज्ञान स्वरूप हैं |

पंचाक्षर मंत्र साधना के लिए सर्वप्रथम साधक को प्रातःकाल उठकर स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर सात्विक एवं श्रद्धामय होकर साधना कक्ष में प्रवेश करें तथा सफेद या पीले रंग की धोती पहनकर, पीले आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाएं | अपने सामने तांबे या स्टील की थाली में ‘पारदेश्वर शिवलिंग’ स्थापित करें (अगर पारद शिवलिंग नहीं है तो कोई भी शिवलिंग या भगवान् शंकर की तस्वीर) को गंगाजल या शुद्ध जल के छींटे देकर किसी साफ वस्त्र से पोंछ दें तथा बाद में चंदन का तिलक लगाकर पुष्प चढ़ाएं | धूप, दीप, दिखाकर मिठाई का भोग लगाएं ! इस साधना के लिए सवा लाख मंत्र जाप करना चाहिए | इसके बाद स्फटिक माला से जाप प्रारम्भ करें | सवा लाख मंत्र जप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन करके साधना पूरी करें| इस साधना की पूर्णता पर साधक को रोगनिवृत्ति, सौभाग्य की प्राप्ति तथा सुख एवं सम्पत्ति का लाभ होगा| साधना की समाप्ति पर शिवलिंग पूजा स्थान में स्थापित दें| और माला शिव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित कर दें|

 मंत्र  : ‘नमः शिवाय’

श्री गणेशाय नमः 

पुजन विधान

१. श्वेत या पीत वस्त्र धारण करके कुश आसन पर बैठे और अपना मुख पूर्व की ओर और यंत्र के साथ भगवान् शंकर का चित्र या शिवलिंग पाटे पर स्थापित करें……. भगवान् शंकर का मुख उत्तर दिशा की ओर हो……..

२. फिर एक लाल फूल एवं अक्षत लेकर वंदना करते हुए अर्पित करें…….

ऊँ गं गणेशाय नमः ! ऊँ गुं गुरुभ्यो नमः ! ॐ नमः शिवाय

३.फिर गुरु स्तुति करें……..
अखंड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् l तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः l

४. फिर निम्न मंत्रों से भस्म या रोली को जल में घोलकर मस्तक पर लगाये…….
” त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्द्धनम् l उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात l” 

फिर गले में रुद्राक्ष की माला गले में धारण करें

५. फिर निम्न मंत्रों से आचमन करें……

नमः शिवाय आत्मतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
नमः शिवाय विद्यातत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
नमः शिवाय शिवतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
नमः शिवाय सर्वतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l

६. फिर शिखा बंधन , प्राणायाम करें……. दीप प्रज्वलित करे

७. फिर संकल्प करे …… हाथ में जल लेकर ये संकल्प मंत्र बोलकर

“अद्येत्यादि ममाशेष दुरित क्षयपूर्व कर्मभीष्ट फल प्राप्तयर्थं पंचाक्षर मंत्र भगवान् शंकर प्रीतये साधनां करिष्ये ”

श्री विग्रह के सामने जल गिरा दें………. इसके बाद 3 बार सिर के ऊपर जल छिड़के

८ . फिर बायें पाँव को ३ बार पटकते हुए

“ऊँ श्लीं पशु हुं फट् ” का वाचन करें!

9. उसके बाद भगवान् शंकर का ध्यान करे

ध्यान मंत्र : “कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारं सारं भुजगेंद्रहारं ! सदावसन्तं हृदयारविंदे भवं भवानी सहितं नमामि”

10. फिर विनियाग करें, (दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न विनियोग मंत्र पढ़ें बाद में इस जल को भूमि पर छोड़ दें| )

विनियोग : अस्य श्री शिव मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि अनुष्टुप छंदः श्री सदाशिव देव शक्तिम ‘म’ कीलकम ‘शिवाय’ बीजम् सदाशिव प्रीत्यर्थ जपे विनियोग

इसके बाद साधक करन्यास तथा हृदयादिन्यास करें

करन्यास :
(न)       अंगुष्ठाभ्यां नमः|
(मः)      तर्जनीभ्यां स्वाहा|
(शि)      मध्यामाभ्यां वषट|
(वा)      अमामिकाभ्यां हूं|
(य)       कनिष्ठिकाभ्यां वौषट|
(नमः शिवाय)   करतलकर पृष्ठीभ्यां नमः

हृदयशक्ति न्यास :
(न)          हृदयाय नमः
(मः)         शिरसे स्वाहा
(शि)         शिखायै वषट
(वा)          कवचाय हूं
(या)          नेत्रत्रयाय वौषट
(नमः शिवाय) अस्त्राय फट

मानस-पूजनः

ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्वकं गन्धं समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश तत्त्वात्वकं पुष्पं समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु तत्त्वात्वकं धूपं घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि तत्त्वात्वकं दीपं दर्शयामि नमः।
ॐ वं जल तत्त्वात्वकं नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्वकं ताम्बूलं समर्पयामि नमः।

इसके बाद स्फटिक या रुद्राक्ष माला से जाप प्रारम्भ करें | सवा लाख मंत्र जप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन करके साधना पूरी करें| इस साधना की पूर्णता पर साधक को रोगनिवृत्ति, सौभाग्य की प्राप्ति तथा सुख एवं सम्पत्ति का लाभ होगा| साधना की समाप्ति पर शिवलिंग पूजा स्थान में स्थापित दें| और माला शिव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित कर दें | पंचाक्षर मंत्र की सिद्धता के बाद और किसी मंत्र या साधना की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती, क्योंकि शिव ही साक्षात परब्रह्म हैं, वही परमानंद हैं, वही ज्ञान स्वरूप हैं |

पुराणों के अनुसार पुण्य-काल में वेदों एवं शास्त्रों की समस्त शक्ति इस पंचाक्षर मंत्र में समाहित होकर रहती है| पुनः सृष्टि-क्रम की दशा में नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने सृष्टि रचना काल, जिज्ञासावश भगवान नारायण से प्रार्थना की तो उन्होंने इस ‘पन्चक्षरी मंत्र’ का उपदेश दिया गया तथा भगवान ने इस मंत्र के विशेष रहस्यों से ब्रह्मा को अवगत कराया| फिर ब्रह्मा ने विशेष सिद्धि लाभ के लिए इसी मंत्र के द्वारा घोर तपस्या की तथा सृष्टि निर्माण में समर्थ हुए| तदन्तर अन्य ऋषिगण भी इस मंत्र की महत्ता को ब्रह्मा से प्राप्त करके प्रभावित हुए|

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

three × three =