पितृ पक्ष मे करे विशेष उपाय………पितृ दोष, मातृ दोष जैसे अनेक दोषो से पाये मुक्ति भाग : १

पितृ पक्ष मे करे विशेष उपाय………पितृ दोष, मातृ दोष जैसे अनेक दोषो से पाये मुक्ति

बृहतपराशर होरा शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली में 14 प्रकार के शापित योग होते हैं। जिनमें पितृ दोष, मातृ दोष, भ्रातृ दोष, मातुल (मामा) दोष, प्रेत दोष आदि प्रमुख दोष वर्णित है। जब व्यक्ति संसार में जन्म लेता है तो वह अपनी कुण्डली में बहुत से योगों को लेकर पैदा होता है जिसमे योग बहुत अच्छे हो सकते हैं, बहुत खराब भी हो सकते हैं, और कुछ मिश्रित फल देने वाले होते हैं ।

कई बार व्यक्ति के पास सभी कुछ होते हुए भी वह परेशान और दुखी रहता है, जब व्यक्ति को अपनी परेशानियों का कारण नहीं समझ आता तब वह ज्योतिषीय सलाह लेता है। तब उसे पता चलता है कि उसकी कुण्डली में पितृ-दोष या ऊपर बताये हुए दोषो  में से कोई दोष उस व्यक्ति की कुंडली में विद्यमान है और इसी कारण वह व्यक्ति परेशान है।

इन शाप या दोषों के कारण व्यक्ति को स्वास्थ्य हानि, आर्थिक संकट, व्यवसाय में रुकावट, संतान संबंधी समस्या आदि का सामना करना पड़ सकता है |

आइये चर्चा करते है……….

पितृ दोष: पितृ दोष के बहुत से कारण हो सकते हैं, उनमें से जन्म कुण्डली के आधार पर कुछ कारणों का उल्लेख किया जा रहा है जो निम्नलिखित हैं :-

  • जन्म कुण्डली के पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें या दसवें भाव में यदि सूर्य-राहु या सूर्य-शनि एक साथ स्थित हों तब यह पितृ दोष माना जाता है | इन भावों में से जिस भी भाव में यह योग बनेगा उसी भाव से संबंधित फलों में व्यक्ति को कष्ट या संबंधित सुख में कमी हो सकती है |
  • सूर्य यदि नीच का होकर राहु या शनि के साथ है तब पितृ दोष के अशुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है |
  • किसी जातक की कुंडली में लग्नेश यदि छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित है और राहु लग्न में है तब यह भी पितृ दोष का योग होता है |

मातृ दोष – यदि कुंडली में चंद्रमा पंचम भाव का स्वामी होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रान्त हो और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में है तब मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी का अनुभव हो सकता है। जन्म कुंडली में चंद्र-राहु, चंद्र-केतु, चंद्र-बुध, चंद्र-शनि,आदि की युति से मातृ दोष होता है, यह दोष भी पितृ दोष की ही भाँति प्रभावी होता है.

भ्रातृ दोष –  तृतीय भावेश मंगल यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु के साथ पंचम भाव में हो तथा पंचमेश व लग्नेश दोनों ही अष्टम भाव में है तब भ्रातृ शाप के कारण संतान प्राप्ति बाधा तथा कष्ट का सामना करना पड़ता है।

सर्प दोष – यदि पंचम भाव में राहु है और उस पर मंगल की दृष्टि हो या मंगल की राशि में राहु हो तब सर्प दोष की बाधा के कारण संतान प्राप्ति में व्यवधान आता है या संतान हानि होती है।

ब्राह्मण श्राप या दोष – किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि धनु या मीन में राहु स्थित है और पंचम भाव में गुरु, मंगल व शनि हैं और नवम भाव का स्वामी अष्टम भाव में है तब यह ब्राह्मण श्राप की कुंडली मानी जाती है और इस ब्राह्मण दोष के कारण ही संतान प्राप्ति में बाधा, सुख में कमी या संतान हानि होती है।

मातुल (मामा) श्राप – यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु तथा राहु हो तब मामा के श्राप से संतान प्राप्ति में बाधा आती है।

प्रेत श्राप – किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि पंचम भाव में शनि तथा सूर्य हों और सप्तम भाव में कमजोर चंद्रमा स्थित हो तथा लग्न में राहु, बारहवें भाव में गुरु हो तब प्रेत श्राप के कारण वंश बढ़ने में समस्या आती है। यदि कोई व्यक्ति अपने दिवंगत पितरों और अपने माता-पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं करता हो या अपने जीवित बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रह हो तब इसी प्रेत बाधा के कारण वंश वृद्धि में बाधाएँ आ सकती हैं।

TO BE CONTINUED………………….

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