क्यों निर्जला एकादशी व्रत को करने से वर्ष भर की एकादशी व्रत करने का पुण्य प्राप्त होता है व्रत कथा और विधान

हमारे ऋषि मुनि त्रिकालदर्शी थे उनसे भूत-भविष्य और वर्तमान कुछ भी छिपा नहीं था तथा उन्हों ने अपने ग्रंथो और संहिताओं में प्रत्येक युगों का वर्णन भली भांति रूप से किया है। जिसमे कलियुग के लिए विशेष वर्णन मिलता है कि कलयुग में मनुष्य धर्महीन अर्थात धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाला होगा ! जप तप दान आदि में उसकी कोई रूचि नहीं होगी केवल भोग विलासों आदि में अपना समय को व्यर्थ करेगा ! इस कलयुग में भगवान् का नाम के स्मरण मात्रा से ही जीवों का कल्याण बताया गया है “कलयुग केवल आम आधारा” ! हमारे हिन्दू धर्म में प्रत्येक पर्वों और व्रतों का विशेष महत्व और स्थान है तथा वह क्यों विशेष और महत्वपूर्ण रखती है उनका इतिहास भी प्राप्त होता है !

परन्तु एकादशी व्रत का महात्यम सबसे विशेष बताया गया है, सभी ऋषि-मुनि तथा देवी-देवताओं द्वारा एकादशी व्रत का महात्यम बताया गया है कहते है कि मनुष्य ने चाहे कितना भी बड़ा और घृणित पाप ही क्यों नहीं किया हो केवल और केवल एकादशी का सविधि व्रत के करने से मनुष्य अपने किये हुए सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर निर्मल हो जाता है ! उसके पाप उस ही तरह समाप्त हो जाते है जिस प्रकार से अग्नि के प्रभाव से घास के ढेर क्षण मात्र में राख में परिवर्तित हो जाता है !

कलयुग में मनुष्य के कल्याण हेतु कि मनुष्य के थोड़े से ही प्रयत्न से ही उसका कल्याण हो जाए इसीलिए बहुत से लघु उपायों का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथो से प्राप्त होता ! वैसे तो हिंदू मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक महीने में एकादशी का व्रत करने का महत्व बताया गया है और प्रत्येक एकादशी का अपना विशेष महत्व भी है ! परन्तु निर्जला एकादशी व्रत को करने से वर्ष भर कि सम्पूर्ण एकादशी व्रतों को करने का फल प्राप्त होता है ! इसके पीछे अपना इतिहास है जो कुछ इस प्रकार है

निर्जला एकादशी व्रत कथा

जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था।
युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिए।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|

तब वेदव्यासजी कहने लगे: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।

भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों  एक‍ा‍दशीयों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्ष भर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में “वृक” नाम वाली अग्नि है (इसीलिए भीम को वृकोदर से भी जाना जाता है) सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।
अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।
व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।
यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।
यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।
व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।
इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।
जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

नोट : निर्जला एकादशी को भीमसेन या पांडव एकादशी भी कहा जाता है 1

 कब करें एकादशी व्रत का पारण और कब नहीं

इस व्रत का पारण यदि कोई व्रती प्रात: काल नहीं कर पाया है तो उसे दोपहर के समय कर लेना चाहिए। मान्यताओं के मुताबिक कि हरि वासर की अवधि में पारण न करें अन्य्था व्रत का फल नहीं पाप मिलता है। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि को कहा जाता है। कभी- कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है जैसे कि इस बार। ऐसे में पहले दिन मनाई जाने वाली एकादशी परिवार वालों के लिए या कह लें गृहस्थों के लिए होती है। दूसरे दिन वाली एकादशी सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं के लिए होती है। दो दिन पड़ने वाली एकदाशी दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं। भगवान विष्णु को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनके भक्त दोनों दिन एकादशी व्रत रख सकते हैं !

निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि

  • एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर तीर्थ स्नान करना चाहिए। संभव न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहाना चाहिए।
  • इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा, दान और दिनभर व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए।
  • पीले कपड़े पहनकर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।
  • पूजा में पीले फूल और पीली मिठाई जरूरी शामिल करनी चाहिए।
  • इसके बाद ‘ऊं नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
  • जल से कलश भरे और उसे सफेद वस्त्र से ढककर रखें। उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

एकादशी मे क्या दान करना चाहिये 

इस दिन जल पिलाने और जल दान करने की परंपरा है। इस एकादशी पर जल, कपड़े, आसन, जूता, छतरी, पंखा और फलों का दान करना चाहिए। इस दिन जल से भरे घड़े या कलश का दान करने वाले के हर पाप खत्म हो जाते हैं। इस दान से व्रत करने वाले के पितर भी तृप्त हो जाते हैं।

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