मन्दिर में ध्वजा क्यों चढ़ाई जाती है और उसका महत्व क्या है ?

मन्दिर में ध्वजा क्यों चढ़ाई जाती है और उसका महत्व क्या है ?

सनातन हिन्दू संस्कृति में ध्वजा को विजय,संगठन तथा संस्कृति का प्रतीक माना जाता है ,जो की हमेशा हमें हमारे संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश देता है ! ऋगवेद संहिता के अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में भी ध्वजा के प्रयोगों का उल्लेख मिलता है। ध्वजा को मंदिरों पर एक विशेष ऊंचाई पर स्थापित किया जाता है जिससे कोई भी व्यक्ति उस ध्वजा के दर्शन कर सके, ऐसा मन जाता है की अगर व्यक्ति किसी भी मंदिर में लगे ध्वजा को पूर्ण श्रद्धा भाव से नमस्कार कर लेता है तो उस मंदिर में विराजित भगवान् के श्री विग्रह के दर्शन करने का सौभाग्य उसे प्राप्त हो जाता है !
ध्वजा को समय का प्रतीक भी माना जाता है , जिस प्रकार ध्वजा आकाश में बिना किसी रोक टोक स्वतंत्र रूप से लहराता है,जो की समय का चलायमान होना बताता है !
पुराने समय हमारे पूर्वज ध्वजा से समय निर्धारण करने की कला में पारंगत थे ! ध्वजा का महत्व केवल धार्मिक तौर पर ही नहीं अपितु वास्तु में भी इसका विशेष स्थान है ! ध्वजा में ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तिओ का समावेश होता है,जो की रक्षा कवच का काम करती है, इसलिए मंदिरों में सदैव ध्वजा होती है।
हिन्दू धर्म में सभी रंगो के जैसे की पीले, काले, सफेद, नीले, हरे, लाल तथा पंचरंगा (अथार्त पांच रंग वाले) ध्वजों का उपयोग में लाया जाता है। प्रत्येक रंग और आकृति वाले ध्वजा अपना कुछ विशेष इतिहास लिए होती है ! हिंदू धर्म में ध्वजों के रंग भिन्न-भिन्न होने के बावजूद सभी का एक प्रमुख ध्वज केसरिया रंग ही होता है ! ध्वजों के ऊपर जो चिन्ह अंकित होते हैं उनमें सर्वमान्य और प्रमुख ॐ और त्रिशूल का चिन्ह है । इसके अलावा विशेष अवसर या समुदाय विशेष के अलग अलग चिन्ह होते हैं । लेकिन ॐ अंकित केसरिया ध्वज संपूर्ण हिन्दू जाति समूह का एकमात्र ध्वज होता है।
हमारे हिन्दू धर्मो में ध्वजा रोपण का विशेष महत्व यह भी है क़ि मन्दिर में ध्वजा चढ़ाने से मनुष्य की सम्पत्ति की सदा वृद्धि होती रहती है और साथ ही साथ ध्वज अर्पण करने से मनुष्य हर क्षेत्र में विजयी होता है और उसकी यश-पताका चारों ओर फहराती है तथा मनुष्य इस लोक में सभी प्रकार के सुख भोग कर परम गति को प्राप्त होता है । अपनी विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष अवसरों पर मंदिरो और धार्मिक स्थलों पर ध्वजा चढ़ाने का प्रचलन आदि काल से चला आ रहा है, इसमें सर्वप्रथम जिस भी कामना से व्यक्ति ध्वजा रोपण करना चाहता है वह उसका संकल्प लेते है तथा जब वह “अमुक” मनोकामना पूर्ण हो जाती है तब विशेष पूजा अर्चना के बाद मंदिर पर उस ध्वजा का रोपण किया जाता है ! वैसे से तो आप ध्वजा रोपण कभी भी कर सकते है, परन्तु विशिष्ट कामनाओ क़ि पूर्ति के लिए विशेष मास,तिथि नक्षत्र और वारो का चुनाव करना पड़ता है।

प्रत्येक देवी -देवता के अपनी विशेष ध्वजा होती है जिन पर विशेष (वाहन) चिह्न तथा आकृति होती है जो क़ि उस देवी देवता क़ि शक्ति का प्रतिरूप माना जाता है , जैसे—

  • गणपति—गणपति की ध्वजा का दण्ड तांबे या हाथी दाँत का व ध्वज सफेद रंग का होता है । उस पर मूषक का चिह्न अंकित होता है । गणपति जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि चतुर्थी तथा भाद्रपद मास विशेष फलदायी होता है !
  • गौरी—गौरी की ध्वजा का दण्ड तांबे का व ध्वज बीरबहूटी के समान अत्यंत रक्त वर्ण का होता है ।  उस पर गदा (त्रिशुल) का चिह्न होता है । गौरी जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि अष्टमी और नवमी तथा चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रे विशेष फलदायी होता है !
  • वरुण— वरुण की ध्वजा पर कच्छप चिह्न होता है।
  • विष्णु—विष्णुजी की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज पीले रंग का होता है । उस पर गरुड़ का चिह्न अंकित होता है । विष्णु जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि एकादशी, द्वादशी और पूर्णिमा तिथि  तथा बैसाख, कार्तिक, मार्गशीष तथा माघ मास विशेष फलदायी होता है !
  • शिव—शिवजी की ध्वजा का दण्ड चांदी का व ध्वज सफेद रंग का होता है । उस पर वृषभ का चिह्न अंकित होता है ।
    शिव जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि त्रोयदशी चतुर्दशी और प्रदोष तिथि तथा बैसाख, कार्तिक,मार्गशीष तथा माघ , फाल्गुन तथा सावन मास क़ि शिवरात्रि विशेष फलदायी होता है !
  • ब्रह्माजी—ब्रह्माजी की ध्वजा का दण्ड तांबे का व ध्वज पद्मवर्ण का होता है । उस पर कमल (पद्म) का चिह्न अंकित होता है ।
  • सूर्यनारायण—सूर्यनारायण की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज पचरंगी होता है । उस पर व्योम का चिह्न अंकित होता है
  • भगवती/देवी/दुर्गा—देवी की ध्वजा का दण्ड सर्वधातु का व ध्वज लाल रंग का होता है । उस पर सिंह का चिह्न अंकित होता है । भगवती/देवी/दुर्गा जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि अष्टमी और नवमी तथा चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रे विशेष फलदायी होता है !
  • चामुण्डा—चामुण्डा की ध्वजा का दण्ड लोहे का व ध्वज नीले रंग का होता है । उस पर मुण्डमाला का चिह्न अंकित होता है । चामुण्डा जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि अष्टमी और चतुर्दशी तथा चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रे विशेष फलदायी होता है !
  • कार्तिकेय—कार्तिकेय की ध्वजा का दण्ड त्रिलौह का व ध्वज चित्रवर्ण का होता है । उस पर मयूर का चिह्न अंकित होता है ।
  • बलदेव जी—बलदेव जी की ध्वजा का दण्ड चांदी का व ध्वज सफेद रंग का होता है । उस पर हल का चिह्न अंकित होता है ।
  • कामदेव—कामदेव की ध्वजा का दण्ड त्रिलौह का (सोना, चांदी, तांबा मिश्रित) व ध्वज लाल रंग का होता है । उस पर मकर का चिह्न अंकित होता है ।
  • यम—यमराज की ध्वजा का दण्ड लोहे का व ध्वज कृष्ण वर्ण का होता है । उस पर महिष (भैंसे) का चिह्न अंकित होता है ।
  • इन्द्र—इन्द्र की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज अनेक रंग का होता है । उस पर हस्ती (हाथी) का चिह्न अंकित होता है ।
  • अग्नि—अग्नि की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज अनेक रंग का होता है । उस पर मेष का चिह्न अंकित होता है ।
  • वायु—वायु की ध्वजा का दण्ड लौहे का व ध्वज कृष्ण वर्ण का होता है । उस पर हरिन का चिह्न अंकित होता है ।
  • कुबेर—कुबेर की ध्वजा का दण्ड मणियों का व ध्वज लाल रंग का होता है । उस पर मनुष्य के पैर का चिह्न अंकित होता है ।
  • ऋषिगण – ऋषियों की ध्वजा पर कुश का चिह्न अंकित होता है।
  • हनमान जी—हनुमान जी के ध्वजा का रंग लाल और सिंदूरिया होता है , जिस पर गदा और श्रीराम नाम अंकित होता है । हनुमान जी के ध्वजारोपण के लिए किसी भी मास क़ि पूर्णिमा तथा मंगलवार विशेष फलदायी होता है !

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