क्या आप जानते है मंत्रो में पाये जाने वाले दोष के बारे में

मंत्र दोष

जी हाँ सुनने में बड़ा अजीब से लगता होगा की मंत्रो में भी प्राय: दोष होते है ! यह दोष क्या होते है तथा मंत्रो को इन दोषो से कैसे मुक्त किया जाता है, इन सभी पर प्राय: हमारे ऋषि मुनियो ने बड़ी विस्तार के साथ अपने ग्रंर्थो में वर्णन किया !

मंत्र दोष का अर्थ : मंत्र दोष का अर्थ होता है कि मंत्र में पायी जाने वाली त्रुटियाँ या कमी जिसके कारण मंत्र अपना पूर्ण प्रभाव नहीं देता पता या एक शब्द में कहे तो शक्तिहीन !

ग्रंथो में ऐसा क्यों लिखा होता है कि कोई भी साधना किसी गुरु या विशेषज्ञ कि देखरेख में ही उसका जाप या साधना करे क्योंकि वह व्यक्ति विशेष उस मंत्र में होने वाले दोषो और उसके परिणामों का पूर्ण जानकार होता है !

प्राय: हमारे ग्रंथो में ८ मुख्य दोषो के बारे में वर्णन मिलता है वह कुछ इस प्रकार है : अभक्ति, अक्षर-भ्रान्ति ,लुप्त , छिन्न, ह्रस्व, दीर्घ ,कथन और स्वप्न !

  • अभक्ति   : अभक्ति से प्राय: मतलब है कि जो साधक मंत्र को केवल अक्षर मात्रा समझता है या जो अपने मंत्रो को दूसरे के मंत्रो से हीन समझता है , उसकी मंत्र साधना में अभक्ति दोष आ जाता है ! इस दोष को दूर करने के लिए मंत्रो का अधिक से अधिक श्रद्धा सहित जाप तथा प्रायश्चित करना चाहिए जिसके प्रभाव से उस मंत्र के अधिष्ठाता देवता प्रसन्न हो कर आपको उस मंत्र की सिद्धि प्रदान करते है !
  • अक्षर-भ्रान्ति : गुरु या शिष्य की भूल से मंत्रो के अक्षर के उलट फेर या अक्षर के कम ज्यादा के होने से यह दोष उत्पन्न होता है ! इस दोष के निवारण के लिए अन्य किसी विशेषज्ञ जिसे उस मंत्र से संबंधित पूर्ण ज्ञान है उस व्यक्ति विशेष से विचार विमर्श करके उत्पन्न इस दोष का निवारण करके प्राय: पूर्ण लाभ लिया जा सकता है !
  • लुप्त : मंत्र में किसी किसी भी वर्ण या शब्द का न होना लुप्त दोष कहलाता है ! इस दोष के निवारण के लिए किसी गुरु के सानिध्य प्राप्त करके इस त्रुटि का निवारण कर सकते है !
  • छिन्न : यह दोष तब होता है जब मंत्र के संयुक्त वर्ण में से कोई वर्ण छूट जाये ! अन्य किसी विशेषज्ञ जिसे उस मंत्र से संबंधित पूर्ण ज्ञान है उस व्यक्ति विशेष से विचार विमर्श करके उत्पन्न इस दोष का निवारण करके प्राय लाभ लिया जा सकता है
  • ह्रस्व : दीर्घ वर्ण के स्थान पर ह्रस्व का उच्चारण ह्रस्व दोष की श्रेणी में आता है !
  • दीर्घ : ह्रस्व वर्ण के स्थान पर दीर्घ वर्ण का उच्चारण दीर्घ दोष की श्रेणी में आता है !
  • कथन : कथन दोष से तात्प्रय: यह है की जब साधक जागृत अवस्था में अपना मंत्र किसी अन्य व्यक्ति को अपना मंत्र बता देता है , इस दोष के निवारण हेतु मंत्र हमेशा गुप्त रखना चाहिए !
  • स्वप्न : यह दोष प्राय: जब साधक  स्वप्न या निद्रा अवस्था में अपना मंत्र किसी अन्य व्यक्ति को बता देता है तो यह दोष उत्पन्न होता है, इस दोष के निवारण हेतु अपने गुरु से जानकरी प्राप्त करके तथा मंत्र का अधिक जाप तथा प्रायश्चित करके इस दोष का दोष दूर होता है !

 

समाधान :  इन सभी  दोषो के निवारण हेतु किसी विशेषज्ञ जिसे मंत्रो से संबंधित पूर्ण ज्ञान है उस व्यक्ति विशेष से विचार विमर्श करके उत्पन्न इस दोष का निवारण करके प्राय: पूर्ण लाभ लिया जा सकता है !

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