क्या आप जानते है कि शास्त्रों में किस प्रकार की प्रतिमा का पूजन करना उचित माना गया है

हमारे सनातन धर्म में देव मूर्ति कि पूजा का चलन आदि काल से चला आ रहा है, किन्तु हमारे सनातन धर्म में केवल मूर्ति कि नही इनके अलावा जल में,अग्नि में,हृदय में,सूर्य में तथा वेदी पर भी पूजा कि जाती है ! सनातन धर्म के अनुसार देवता मंत्र स्वरुप होते है ,उनके रूप के अंग-उपांग कल्पित होते है तब उसकी पूजा-अर्चना कि जाती है ! प्रत्येक देवी देवता अपनी कुछ विशेष आकृति लिए होते है ,जिन्हे हम यंत्र के रूप में भी पूजते है जो कि भारतीय कर्मकांड के विशेषज्ञ भली-भांति रूप से जानते है !
हमारे ग्रंथो तथा वेदो में विभिन्न प्रकार कि प्रतिमा या मूर्ति के बारे में वर्णन मिलता है ,जिनकी पूजा-अर्चन से मनुष्य अपने संपूर्ण मनोरथो को पूर्ण करता है ! आगमों के नियमावली के अनुसार, जो मंदिर स्वयंभू देवताओं के उत्पत्ति स्थान पर बने होते हैं अथवा जो किसी ऋषिमुनी, देवता या राक्षस ने बनाए हों, वह स्थान सबसे पवित्र माना जाता है। वहाँ पर किसी भी प्रकार की शास्त्रविधि, कर्मकांड अथवा धार्मिक संस्कार करने की जरुरत नहीं होती। परन्तु अगर कोई मनुष्य जैसे राजा या जनहितैषी मंदिर बनाना चाहे तब उसे आगम और शिल्पशास्त्र के हिसाब से मंदिर आदि के लिए जगह ढूंढ कर वहाँ शास्त्रशुद्ध तरीके से मंदिर बनाकर ईश्वर की मूर्ति की प्राण प्रतिस्थापना और अनुष्ठान करना पड़ता है। इस तरह बने मंदिर में आवर्त-प्रतिष्ठा मतलब दिव्य शक्ति के वास का आवाहन कर उसकी पूर्णता के बाद ही रोज़ाना की पूजा अर्चना शुरू की जा सकती है। वैष्णव आगमों में यह लिखा गया है कि भक्त की इच्छा अनुसार मूर्ति पत्थर, मिट्टी, ईंट या पत्थर, लकड़ी या फिर सोने आदि धातु मिलाकर बनाई जाती है। इसी सारी बातो को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियो ने बहुत ही विस्तार से इनका वर्णन ग्रंथो में किया है प्राय: ये प्रतिमायें छ: प्रकार कि होती है :

  • अकृत्रिम या स्वयंभू प्रतिमा : प्राय: इस प्रकार कि प्रतिमा प्रकृति द्वारा निर्मित होती है, जैसे कि शालिग्राम,शिव लिंग, और द्वारका पूरी का चक्र ! प्राय: इनमें किसी भी प्रकार की शास्त्रविधि, कर्मकांड अथवा धार्मिक संस्कार करने की जरुरत नहीं होती। इस प्रकार कि प्रतिमा पूर्ण रूप से पूजनीय होती है ,इसमें किसी प्रकार का कोई दोष नही होता है !
  • कृत्रिम प्रतिमा : प्राय: इस प्रकार कि प्रतिमा के कई भेद बतायें गए है जिनमे विशेष करके रतन जड़ित, स्वर्ण आदि धातुओं कि, स्फटिक कि , काष्ठ कि,मिट्टी कि ,और चित्र रचित आदि है ! इस प्रकार कि प्रतिमाओं में देवी – देवता से संबंधित रूप और आकृति दे कर तथा कर्मकांड कि विशेष पद्धति से प्राण प्रतिष्ठा और अनुष्ठान आदि करके पूजा अर्चन के रूप में मान्य होती है !
  • अचल प्रतिमा : प्राय: ये प्रतिमायें कई सौ वर्षो से यहाँ पर विराजित होती जिन्हे हम तीर्थादि कि संज्ञा देते है जैसे कि बदरीनाथ, केदारनाथ,हरिद्वार,पुष्कर आदि ! अचल प्रतिमा पूर्ण रूप से प्रभावी होती है तथा इनके दर्शन और पूजा अर्चना करने से व्यक्ति के सभी मनोरथ पूर्ण होते है! हर एक तीर्थ कि अपनी कुछ विशेष मान्यता प्रचलन में है !
  • चल प्रतिमा : कहते हैं कि यह प्रतिमायें किसी दिव्य व्यक्ति जैसे कि ब्रह्म, इंद्र, वरुण आदि तथा ऋषिमुनियों द्वारा तप करके पूजा के लिए प्रस्थापित की होती हैं। जैसे की चामुंडा देवी ,रामेश्वर,सोमनाथ आदि !
  • सजीव प्रतिमा : प्राय: सजीव प्रतिमा के रूप में सदाचारी और ब्रह्मचारी ब्राह्मण जो शास्त्रोक्त जीवन को व्यवहार में अपनाते है और गौ माता को भी सजीव प्रतिमा के रूप में माने जाते है क्योंकि गौ माता में ३३ कोटि देवी देवता विराजमान होते है !
  • निर्जीव प्रतिमा : प्राय: निर्जीव प्रतिमा के रूप में हम पीपल , बरगद आदि वृक्षों को मानते है,हमारे सनातन धर्म वृक्षों की पूजा अर्चना का विशेष महत्व है इसीलिए हमारे शास्त्रों में इनको प्रतिमा की संज्ञा दी गयी है !

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