कोकिला पंचमी व्रत- सुयोग्य पति की कामना के लिए कुंवारी लड़कियाँ रखती है व्रत

वैसे तो कोकिला पंचमी का व्रत सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है , परन्तु दक्षिण भारत में विशेष रूप से प्रचलित है ! कोकिला व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की  पंचमी को बनाया जाता है ! पौराणिक मान्यता के अनुसार सर्वप्रथम यह व्रत माँ पार्वती ने भगवान् शंकर को अपने पति रूप में पाने के लिए इस व्रत को किया था ! तभी से भारत वर्ष में यह व्रत कुमारी कन्या द्वारा सुयोग्य पति की कामना के लिए करती है। इस व्रत के प्रभाव से व्रती को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

कोकिला व्रत की कथा

पौराणिक कथानुसार जब देवो के राजा दक्ष की बेटी सती अपने पिता के अनुमति के खिलाफ भगवान शिव जी से विवाह कर लेती है। जिस कारण राजा दक्ष बेटी सती से नाराज हो जाते है। राजा दक्ष भगवान शिव जी के रहन-सहन से घृणा करते थे।
उनको भगवान शिवजी पसंद नहीं थे। इसी कारण राजा दक्ष बेटी सती से सभी सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। एक बार राजा दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें सभी देव गण एवम देवियों को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिवजी और देवी सती को इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया गया।
भगवान शिव जी माँ सती को बिना बुलाये ना जाने को कहते हैं किन्तु माँ सती उस यज्ञ में शामिल होने अपने पिता के घर पर पहुंच जाती है। इस यज्ञ में माँ सती तथा भगवान शिव जी को अपमानित किया जाता है। इस कारण माँ सती क्रोध में आकर यज्ञ कुण्ड में अपने शरीर का त्याग कर देती है।

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भगववान शिव जी के मना करने के पश्चात यज्ञ में शामिल होने के कारण क्रोध में आकर माँ भगवान शिव जी उन्हें कोकिला बनने का श्राप देते है। इस प्रकार माँ सती कोकिला बन 10 हजार वर्षो तक भटकती रहती है। इसके पश्चात माँ सती को श्राप से मुक्ति मिलती है। अगले जन्म में माँ सती पार्वती का रूप लेकर पुन: अवतरित होती है। इस जन्म में माँ पार्वती कोकिला व्रत को करती है। व्रत के प्रभाव से माँ पार्वती का विवाह भगवान शिव जी से होती है। अत: यह व्रत कुमारी कन्या के लिए अति फलदायी है।

कोकिला व्रत विधि

इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठें, तथा सूर्योदय से पूर्व दैनिक कार्य से निवृत्त होकर स्नान कर लेना चाहिए। तत्पश्चात पीपल वृक्ष या आवला वृक्ष के सान्निध्य में भगवान शिव जी एवम माँ पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करना चाहिए।

भगवान की पूजा जल, पुष्प, बेलपत्र, दूर्वा, धूप, दीप आदि से करें। इस दिन निराहार व्रत करना चाहिए। सूर्यास्त के पश्चात आरती-अर्चना करने के पश्चात फलाहार करना चाहिए। इस व्रत को विवाहित नारियाँ के साथ-साथ कुमारी कन्याएँ भी कर सकती है। इस प्रकार कोकिला व्रत की कथा सम्पन्न हुई।

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