!! अथ श्री गुप्त बीजात्मक सप्तश्‍लोकी दुर्गा मंत्र विधान !!

अथ श्री गुप्त बीजात्मक सप्तश्‍लोकी दुर्गा मंत्र

साधना के क्षेत्र में दुर्गा सप्त शलोकि का पाठ का अपना विशेष महत्वपूर्ण स्थान है और सभी साधक जन इसके प्रभाव से अनभिग्न नहीं है ! केवल इसके सिद्ध पाठ से साधक बड़े से बड़ा और असाधय से भी असाधय कार्य को बड़ी आसानी से कर लेता है, इसमें कोई दोराहय नहीं है ,इसमें केवल एक वस्तु की आवश्यकता होती है तो वो ही माँ भगवती के प्रति पूर्ण विश्वास ! यह विश्वास ही व्यक्ति को अपने कार्य क्षेत्र में और साधना में पूर्ण फल प्राप्त करने में सहायक होता है !
“श्री दुर्गा सप्तश्लोकी” की तरह “गुप्त सप्तश्लोकी मंत्र” विधान जो की अत्यंत गुप्त है, जो की गुरु-शिस्य परंपरा से ही प्राप्त होता है ! यहाँ पर इसका पूर्ण प्रकश किया जा रहा है जो की अत्यधिक प्रभावशाली भी है ! इस मंत्र साधना को करने से दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ को करने पूर्ण फल प्राप्त होता है, इसमें किंचित मात्र भी संशय नहीं करना चाहिए।
यह अत्यधिक तीव्र बीज मंत्र साधना है जो की आप अपने गुरु के सानिध्य और उनसे आज्ञा प्राप्त करके में पूरा लाभ प्राप्त कर सकते है।

पुजन विधान…….

१. लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन पर बैठे और अपना मुख उत्तर की ओर और यंत्र के साथ देवी की फोटो पाटे पर स्थापित करें……. देवी का मुख पूर्व दिशा की ओर हो……..

२. फिर एक लाल फूल एवं अक्षत लेकर वंदना करते हुए अर्पित करें…….
ऊँगं गणेशाय नमः l

ऊँ गुं गुरुभ्यो नमः l

ऊँ महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवताभ्यो नमः l

३.फिर गुरु स्तुति करें……..
अखंड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् l तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः l

४. फिर निम्न मंत्रों से भस्म या रोली को जल में घोलकर मस्तक पर लगाये…….
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्द्धनम् l उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात l

फिर गले में रुद्राक्ष की माला गले में धारण करें

५. फिर निम्न मंत्रों से आचमन करें……

ऐं ह्रीं क्लीं आत्मतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
ऐं ह्रीं क्लीं विद्यातत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
ऐं ह्रीं क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l
ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि स्वाहा l

६. फिर शिखा बंधन , प्राणायाम करें……. दीप प्रज्वलित करे

७. संकल्प करे

फिर हाथ में जल लेकर ये संकल्प मंत्र बोलकर ” अद्येत्यादि ममाशेष दुरित क्षयपूर्व कर्मभीष्ट फल प्राप्तयर्थं श्री गुप्त बीजात्मक सप्तश्‍लोकी दुर्गा मंत्र महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः प्रीतये साधनां करिष्ये ”  यंत्र  या श्री विग्रह के सामने जल गिरा दें……….

इसके बाद 3 बार सिर के ऊपर जल छिड़के

८ . फिर बायें पाँव को ३ बार पटकते हुए ” ऊँ श्लीं पशु हुं फट् ” का वाचन करें!

९. सर्व प्रथम सिद्ध कुंजिका का पाठ करना है ! ( सिद्ध कुंजिका पाठ आप हमरे साइट से प्राप्त कर सकते है क्यूंकि अधिकतर पुस्तकों में पूर्ण पाठ नहीं दे रखा है !)

 

शापोद्धार : इस मन्त्र का आदि और अन्त में सात बार जप करे।

“ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।”

उत्कीलन मन्त्र : इस मन्त्र का जप आदि और अन्तमें इक्कीस-इक्कीस बार होता है।

“ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।”

मृतसंजीवनी विद्या मन्त्र : इस मन्त्र का जप आदि और अन्त में सात-सात बार जपना चाहिये।

ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।

शाप-विमोचन मन्त्र का आरम्भ में ही पाठ करना  हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्‍वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१॥

ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥२॥

ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥३॥

ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥४॥

ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥५॥

ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥६॥

ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥७॥

ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥८॥

ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥९॥

ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१०॥

ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥११॥

ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१२॥

ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१३॥

ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१४॥

ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्‍वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१५॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१६॥

ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्‍वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१७॥

ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी- महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥१८॥

फल श्रुति

इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्‍वर। चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥

एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः। आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥

ध्यान :

ॐ खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाच्छूलं भुशुण्डीं शिर:
शङ्खं संदधतीं करौस्त्रिनयनां सर्वाड्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्‍तुं मधुं कैटभम्॥

ॐ अक्षस्रक्‌परशुं गदेषुकुलिशं पद्‌मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूल पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनु: सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्‌भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

विनियोग:

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषि: अनुष्टुप छन्द: श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता: श्रीदुगाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोग: ।

ऋष्यादि न्यास
नारायण ऋषि:                शिरसि
अनुष्टुप छन्द:                मुखे
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता:  हृदय
ऐं बीजाय नमः                गुह्ये
ह्रीं बीजाय नमः               पादयो
क्लीं बीजाय नमः            कीलकम

करन्यास
ॐ ऐं      अंगुष्ठभ्यां नमः
ॐ ह्रीं     तर्जनीभ्यां नमः
ॐ क्लीं  मध्यमाभ्यां नमः
ॐ ऐं     अनामिकाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं    कनिष्ठिभ्याम नमः
ॐ क्लीं  करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः

हृदयादिन्यास

ॐ ऐं      हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं     शिरसे नमः
ॐ क्लीं  शिखाये वषट
ॐ ऐं      कवचाय हुम्
ॐ ह्रीं     नेत्रत्राय वौषट
ॐ क्लीं  अस्त्राय फट

दिगबंधन 

ऐं ह्रीं क्लीं (कहकर ) सर के ऊपर से चुटकी बजाते हुए दिशा बंधन करे

अथ सप्तशती बीज मन्त्रात्मक पाठ

१.ऐं स्त्रौं नमः

२.ऐं ह्रीं नमः 

३.ऐं स्क्लीम नमः 

४.ऐं ग्लौं नमः 

५.ऐं श्रं नमः 

६.ऐं ह्रौं नमः 

७.ऐं सें नमः 

इति पाठ संपूर्ण

।। अथ अपराधक्षमापणस्तोत्रम् ।।
ॐ अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि।।१।।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।।२।।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।।३।।
अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ।। ४।।
सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।
इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ।। ५।।
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रोन्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।। ६।।
कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ।। ७।।
इस श्लोक पढ़कर देवी के वाम हस्त में जप समर्पित करें।
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसात्सुरेश्वरि।।८।।
अपने आसान के नीचे जल छोड़कर ” ॐ इन्द्राय नमः ” ऐसा ३ तीन बार कह कर जल को अपने मस्तिष्क और आँखों से लगाना है !

 

 

विधि :
१ साधक प्रतिदिन १०८ या १००८ बार इसका जाप कर सकता है !
२ नवरात्री के दिनों में साधक प्रत्यके दिन एक-एक मंत्र १००८ बार जाप कर सकता है और मंत्र जाप का दशांश हवन करके सिद्ध करले !

जाप में सावधानियाँ*

  1. मंत्र का उच्चारण की शुद्धता से करें।
  2. एक निश्चित संख्या में जप करें।
  3. मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए। यदि अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
  4. जप काल में धूप-दीप जलते रहना चाहिए।
  5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
  6. माला को गोमुखी में रखें। जब तक जप की संख्या पूर्ण न हो, माला को गोमुखी से बाहर न निकालें।
  7. जपकाल में ध्यान पूरी तरह मंत्र में ही रहना चाहिए, मन को इधर-उधरन भटकाएँ।
  8. जपकाल में आलस्य व उबासी को न आने दें।
  9. मिथ्या बातें न करें।
  10. जपकाल में स्त्री सेवन न करें।

 

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