एक ऐसा कुंड जहाँ स्नान करने से मिलती है कालसर्प दोष से मुक्ति

 

जी हाँ, भारत देश अपनी विविध संस्कृति और अतुल्य सभ्यता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है ! भारत में बहुत से ऐसे स्थान है जिन्हे देख के व्यक्ति स्तब्ध रह जाता है ! इस धरा में अगर कहीं स्वर्ग है तो केवल और केवल भारत ही है ! भारत के प्रत्येक राज्यों में आपको एक से बढ़कर एक अपनी कला के सौंदर्यता बिखेरते हुए अद्भुत दृश्य देखने को मिलते है ! उन्ही में से विश्व भर में प्रसिद्ध “वाराणसी या बनारस” जिसका नाम लेते ही मन में भक्ति और शक्ति का संचार होने लगता है ! वाराणसी सहस्रों वर्षों से भारत का विशेष कर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग ५००० वर्ष पूर्व की थी,जिस कारण ये आज एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिंदुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। “वाराणसी या बनारस” में को अनेकों घाट तथा मंदिर देखने को मिलते है जिसमे काशी विश्वनाथ मंदिर मुख्यतः है, यह मंदिर भगवान् शंकर को समर्पित है !

क्या आप जानते है कि , धर्म की नगरी काशी या बनारस में एक ऐसा कुंड (तालाब) है, जहां आज भी नागों का निवास माना जाता है। मान्यता है कि इस कुंड में दूध चढ़ाने और दर्शन तथा स्नान करने से काल सर्प दोष से मुक्ति मिलती है। यह कुंड काशी के जैतपुरा क्षेत्र में स्थित है। यह स्थान कर्कोटक नाग तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। इसको नाग कुआँ मंदिर भी कहते है , मान्यता है कि इस कुएँ का रास्ता सीधे नाग लोक को जाता है। नाग कुंड के अंदर अति प्राचीन शिवलिङ्ग भी स्थापित है जो पूरे वर्ष भर जल में डूबा रहता है तथा नाग पंचमी से पूर्व इसके जल को खाली करके इस शिवलिङ्ग कि विशेष कर्मकांड पद्धति द्वारा पूजा अर्चना करी जाती है ! यहाँ पर दूर – दराज से भक्तगण इसके पूजा, दर्शन तथा स्नान करने के लिए यहाँ पर आते है ! लोगो का ऐसा विश्वास है कि यहाँ पर शिवलिङ्ग कि पूजा अर्चना तथा स्नान से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है ! वैसे तो यह स्थान पूरे वर्ष भर भक्तो के लिए खुला रहता है परन्तु शिवलिङ्ग के दर्शन केवल नाग पंचमी को ही होते है इसी कारण नाग पंचमी पर शिवलिङ्ग कि पूजा करना अपना विशेष महत्व रखता है !

पौराणिक मान्यता तथा कथाओं के अनुसार, इसी जगह पर शेषावतार (नागवंश) के महर्षि पतंजलि ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या करके उनके दर्शन तथा उनसे वरदान प्राप्त किया तथा व्याकरणाचार्य पाणिनी के भाष्य की रचना की थी ।

पूरे विश्व में काल सर्प दोष की सिर्फ तीन जगह ही पूजा होती हैं । उसमें से ये कुंड प्रधान कुंड है। यहाँ पर नाग देवता के पूजन व दर्शन करने से तथा दूध चढ़ाने से काल सर्प के दोष से मुक्ति मिलती है ।

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