चातुर्मास्य व्रत की महिमा…..सम्पूर्ण विधि

 

 

हिन्दू धर्म में चार विशेष महीने होते हैं जिनमे उपवास, व्रत ,जप और तप का विशेष महत्व होता है , वे महीने हैं -सावन,भाद्रपद,आश्विन और कार्तिक जिन्हे हिन्दू धर्म में ‘चातुर्मास’ कहा गया है। यह पावन चातुर्मास व्रत आषाढ़ मास की देव शयन एकादशी से प्रारंभ होकर कि जो कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी तक चलती है. इस समय में श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में लीन रहते हैं इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने की मनाही होती है, इसी अवधि में ही आषाढ़ के महीने में भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया था और राजा बलि से तीन पग में सारी सृष्टि दान में ले ली थी. उन्होंने राजा बलि को उसके पाताल लोक की रक्षा करने का वचन दिया था. फलस्वरूप श्री हरि अपने समस्त स्वरूपों से राजा बलि के राज्य की पहरेदारी करते हैं. इस अवस्था में कहा जाता है कि भगवान विष्णु निद्रा में चले जाते हैं. परन्तु ध्यान साधना दान ,जप और तप करने वाले लोगों के लिए ये माह महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान शारीरिक और मानसिक स्थिति तो सही होती ही है,साथ ही वातावरण भी अच्छा रहता है।

चातुर्मास्य व्रत की महिमा

श्रीकृष्ण बोले कि हे राजन ! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को देवशयनी एकादशी भी कहते हैं। चातुर्मास का व्रत इसी एकादशी से प्रारंभ होता है। युधिष्ठिर बोले कि हे कृष्ण ! भगवान् विष्णु के शयन का व्रत किस प्रकार करना चाहिए और चातुर्मास्य के व्रत भी कहिए।
श्रीकृष्ण बोले कि हे राजन! अब मैं आपको भगवान विष्णु के शयन व्रत और चातुर्मास्य व्रत की महिमा सुनाता हूँ। आप सावधान होकर सुनिए। जब सूर्य कर्क राशि में आता है तो भगवान को शयन कराते हैं और जब तुला राशि में आता है तब भगवान को जगाते हैं। अधिक मास के आने पर भी यह विधि इसी प्रकार चलती है। इसके सिवाए और महीने में न तो शयन कराना चाहिए न जगाना चाहिए।
आषाढ़ मास की एकादशी का विधिवत व्रत करना चाहिए। उस दिन विष्णु भगवान की चतुर्भुजी सोने की मूर्ति बनाकर चातुर्मास्य व्रत के नियम का संकल्प करना चाहिए। भगवान की मूर्ति को पीतांबर पहनाकर सुंदर श्वेत शैया पर शयन कराएँ और धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान का षोडपोचार पूजन करें, पंचामृत से स्नान आदि कराकर इस प्रकार कहें- हे ऋषिकेश, माता लक्ष्मीजी सहित मैं आपकी पूजा करता हूँ। आप जब तक चातुर्मास शयन करें।
जो मनुष्य चातुर्मास में पीपल के वृक्ष तथा भगवान विष्णु की परिक्रमा कर पूजा करते हैं उन्हें विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। जो संध्या समय देवताओं-ब्राह्मणों को दीप दान करते हैं तथा विष्णु का हवन करते हैं वे विमान में बैठकर अप्सराओं से सेवित होते हैं। मेरे इस व्रत को निर्विघ्न संपूर्ण करें।इस प्रकार से विष्णु भगवान की स्तुति करके शुद्ध भाव से मनुष्यों को दातुन आदि नियमों का पालन करना चाहिए। विष्णु भगवान के व्रत को ग्रहण करने के पाँच काल वर्णन किए हैं। देवशयनी एकादशी से यह व्रत किया जाता है। एकादशी, द्वादशी, पूर्णमासी, अष्टमी और कर्क की संक्रांति से भी व्रत प्रारंभ किया जाता है।
कार्तिक शुक्ल द्वादशी को इसका समापन होता है। इस व्रत को करने वाले सूर्य जैसे दीप्तिमान होकर विमान पर बैठकर स्वर्ग को जाते हैं। इस व्रत में गुरु व शुक्र उदय-अस्त का कोई विचार अवश्य करें। यदि सूर्य धनु राशि के अंश में भी आ गया तो यह तिथि पूर्ण समझी जाती है। जो स्त्री या पुरुष पवित्र होकर शुद्धता से इस व्रत को करते हैं, वे सब पापों से छूट जाते हैं। बिना संक्रांति का मास (मलमास) देवता और पितृकर्मों में वर्जित है। अब इसका अलग-अलग फल प्रस्तुत है। जो मनुष्य प्रतिदिन मंदिर में झाड़ू देते हैं, जल से धोते हैं, गोबर से लीपते हैं, मंदिरों में रंग करते हैं, उनको सात जन्मों तक ब्राह्मण की योनि मिलती है। जो मनुष्य चातुर्मास में भगवान को दूध, दही, घी, शहद और मिश्री आदि से स्नान कराते हैं तथा ब्राह्मणों को भूमि, स्वर्ण आदि दान देते हैं, वे वैभवशाली होकर अंत में स्वर्ग को जाते हैं।

चौमासा या चतुर्मास का अलग अलग धर्मों में महत्व

चौमासा या चतुर्मास का केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं अपितु अन्य धर्मो में भी विशेष महत्व रखता है यहाँ कुछ अन्य धर्म के अनुसार इसका महत्व दर्शाया जा रहा है :

  • जैन धर्म में चौमासा का महत्व : जैन धर्म में चौमासे का बहुत अधिक महत्व होता हैं. वे सभी पुरे महीने मंदिर जाकर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं एवं सत्संग में भाग लेते हैं. घर के छोटे बड़े लोग जैन मंदिर परिसर में एकत्र होकर ना ना प्रकार के धार्मिक कार्य करते हैं. गुरु वरों एवं आचार्यों द्वारा सत्संग किये जाते हैं एवं मनुष्यों को सद्मार्ग दिखाया जाता हैं. इस तरह इसका जैन धर्म में बहुत महत्व है.
  • बौद्ध धर्म में चौमासा का महत्व : गौतम बुद्ध राजगीर के राजा बिम्बिसार के शाही उद्यान में रहे, उस समय चौमासा की अवधि थी. कहा जाता है साधुओं का बरसात के मौसम में इस स्थान पर रहने का एक कारण यह भी था कि उष्णकटिबंधीय जलवायु में बड़ी संख्या में कीट उत्पन्न होते हैं जो यात्रा करने वाले भिक्षुकों द्वारा कुचल जाते हैं. इस तरह से इसका बौद्ध धर्म में भी महत्व अधिक है.
  • हिन्दू धर्म में चौमासा का महत्व : हिन्दू धर्म के सभी बड़े त्यौहार इन्ही चौमासा के भीतर आते हैं. सभी अपनी मान्यतानुसार इन त्यौहारों को मनाते हैं एवं धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं.

चौमासा या चतुर्मास के अंतर्गत विभिन्न मासों की विशेष महत्व 

सावन,भाद्रपद,आश्विन और कार्तिक (आषाढ़ के 5 दिन चौमास के अंतर्गत आते हैं )जिन्हे हिन्दू धर्म में ‘चातुर्मास’ कहा गया है।

आषाढ़ : सबसे पहला महीना आषाढ़ का होता है, जो शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से शुरू होता हैं. ऐसा माना जाता है कि इस दिन से भगवान् विष्णु सोने जाते हैं. आषाढ़ के 5 दिन चौमास के अंतर्गत आते हैं. इसलिए ऐसा भी कहा जाता है कि चौमास अर्द्ध आषाढ़ माह से शुरू होता है. इस माह में गुरु एवं व्यास पूर्णिमा का त्यौहार भी मनाया जाता है, जिसमें गुरुओं के स्थान पर धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं. कई जगहों पर मेला सजता हैं ।

  • आषाढ़ के महीने में अंतिम समय में भगवान वामन और गुरु पूजा का विशेष महत्व होता है ।
  • आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु की पूजा उपासना करें ।
  • इससे जीवन के हर संकट दूर होंगे ।

श्रावण : दूसरा महीना श्रावण का होता है, यह महीना बहुत ही पावन महीना होता है, इसमें भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती हैं. इस माह में कई बड़े त्यौहार मनाये जाते हैं जिनमें रक्षाबंधन, नाग पंचमी, हरियाली तीज एवं अमावस्या, श्रावण सोमवार तथा मंगला गौरी आदि विशेष रूप से शामिल हैं. रक्षाबंधन का त्यौहार भाई बहनों का त्यौहार होता है. बहने अपने भाइयों को राखी बांधती हैं. वहीं नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा की जाती है. हरियाली तीज में सुहागन औरतें भगवान् शिव एवं देवी पार्वती की पूजा करती है एवं व्रत भी रखती है. इस माह में श्रावण सोमवार का महत्व बहुत अधिक है. इस माह में वातावरण बहुत ही हरा भरा रहता है ।

  • सावन में भगवान शिव की पूजा करें ।
  • इससे विवाह ,सुख ,सौभाग्य और आयु की प्राप्ति होगी ।
  • सावन के महीने में साग, हरी सब्जियों के सेवन से बचें.

भाद्रपद : तीसरा महीना भादों अर्थात भाद्रपद का होता हैं. इसमें भी कई बड़े एवं महत्वपूर्ण त्यौहार मनायें जाते हैं जिनमें कजरी तीज, हर छठ, जन्माष्टमी, गोगा नवमी, जाया अजया एकदशी, हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी, डोल ग्यारस, अन्नत चतुर्दशी, पितृ श्राद्ध आदि शामिल हैं. हर त्यौहार का हिन्दू धर्म में अपना एक अलग महत्व होता है, और लोग इसे बड़े हर्षोल्लास  से मनाते हैं. इस तरह यह माह भी हिन्दू रीति रिवाज़ों से भरा पूरा रहता हैं ।

  • भाद्रपद में भगवान कृष्ण की उपासना करें ।
  •  इससे संतान और विजय का वरदान मिलेगा ।
  • भादों में दही न खाएं

आश्विन माह : चौथा महीना आश्विन का होता हैं. अश्विन माह में पितृ मोक्ष अमावस्या, नव दुर्गा व्रत, दशहरा एवं शरद पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण एवं बड़े त्यौहार आते हैं. इस माह को कुँवार का महीना भी कहा जाता हैं. नव दुर्गा में लोग 9 दिनों का व्रत रखते हैं इसके बाद दसवें दिन दशहरा का त्यौहार बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं ।

  • आश्विन मास में पितृ देवों तथा अपने पूर्वजों की पूजा ,सेवा तथा आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है ।
  • आश्विन में देवी और श्रीराम की उपासना करें , इससे विजय, शक्ति और आकर्षण का वरदान मिलेगा ।
  • आश्विन माह में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए

कार्तिक माह : यह चातुर्मास का अंतिम महीना होता है, जिसके 15 दिन चौमास में शामिल होते हैं. इस महीने में दीपावली के पांच दिन, गोपा अष्टमी, आंवला नवमी, प्रबोधिनी ग्यारस अथवा देव उठनी ग्यारस जैसे त्यौहार आते हैं. इस माह में लोग अपने घर में साफ सफाई करते हैं, क्योंकि इस माह में आने वाले दीपावली के त्यौहार का हमारे भारत देश में बहुत अधिक महत्व है. इसे लोग बहुत ही धूम धाम से मनाते हैं ।

  • कार्तिक में श्री हरि और तुलसी की उपासना होती है इससे राज्य सुख और मुक्ति मोक्ष का वरदान मिलता हैं ।
  • गायत्री मंत्र, पीपल की पूजा और एक समय के आहार से पूर्ण रूप से तेज़ भक्ति और आयु की प्राप्ति होती हैं ।
  • कार्तिक माह में दालों का सेवन नहीं करना चाहिए.

पुरुषोत्तम मास / अधिक मास : इस चौमास के अलावा अधिक मास का भी बहुत महत्व हैं इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता हैं. यह मास तीन साल में एक बार आता हैं, एवं गणना में अनुसार वह किसी भी महीने में आ जाता हैं. इस अधिक मास का भी उतना ही महत्व होता हैं जितना की चौमास का. जब यह अधिक मास भाद्रपद में आता है, जो कि कई वर्षों में होता हैं तब उसका महत्व और अधिक बढ़ जाता हैं।

चातुर्मास में किये जाने वाले महत्वपूर्ण नियम 

  • चातुर्मास व्रत में पृथ्वी पर शयन और सूर्योदय से पहले अर्थात ब्रह्म मुहूर्त में उठना तथा स्नानादि करना चाहिए।
  • चातुर्मास व्रत में अधिकतर समय मौन रहना चाहिए।
  • चातुर्मास व्रत में दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए।
  • चातुर्मास में भगवान का ध्यान करना चाहिए तथा ज्यादा से ज्यादा भगवन नाम का स्मरण करना चाहिए .
  • चातुर्मास व्रत में प्याज़, लहसन, बैंगन, मसूर जैसे भोज्य पदार्थ से पूर्ण रूप से परहेज करना चाहिए
  • चातुर्मास व्रत में पैर में चप्पल और जूते आदि नहीं पहनना चाहिए.
  • चातुर्मास व्रत में क्षौर कर्म यानी बाल एवं दाड़ी नहीं कटवाने चाहिए .
  • चातुर्मास में जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण अर्थात ब्रह्मचर्य रखता है उसे विशेष फल प्राप्त होते हैं.
  • इनके अलावा चातुर्मास व्रत में बुराई और झूठ नहीं बोलना चाहिए. वाणी पर नियंत्रण रखें. क्रोध न करें और विवाद से दूर रहें. घर में कलह न करें और कर्ज लेने आदि से बचे .
  • चातुर्मास में धार्मिक कर्म कांड गीता पाठ,सुंदर कांड, भजन एवं रामायण पाठ सभी अपनी श्रद्धानुसार करते हैं. इसके अलावा इस समय कई दान पुण्य एवं तीर्थयात्रा भी की जाती हैं.

चातुर्मास में किस किस वस्तुओं को अपने आहार के तौर पर लेना चाहिए

मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान बादल और वर्षा के कारण सूर्य और चन्द्रमा की शक्ति कमजोर पड़ जाती है. जिसका मनुष्य की सेहत पर भी असर पड़ता है. माना जाता है कि चातुर्मास के समय पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है. जिस कारण वर्षा ऋतु में संक्रामक रोगों का ख़तरा बढ़ जाता है. इस मौसम में जल की अधिकता होती है और सूर्य का प्रभाव धरती पर कम हो जाता है. इसलिए व्यक्ति को चातुर्मास में अनुशासित जीवन शैली को अपनाना चाहिए. जिससे वह स्वस्थ्य रह सके. चातुर्मास में आसानी से पचाने वाली चीजों का सेवन करना चाहिए. दूध और फलो का नियमित सेवन करना चाहिए. स्वच्छता का पूरा ध्यान रखना चाहिए. समय समय पर व्रत भी रखने चाहिए। दरअसल इन 4 महीनों में व्यक्ति की पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है। इससे अलावा भोजन और जल में बैक्टीरिया की तादाद भी बढ़ जाती है। इस समय पानी को ऊबालकर पीना ज्यादा लाभकारी होता है।

चातुर्मास में किस किस वस्तुओं को का परहेज तथा त्याग चाहिए

चातुर्मास में गुड का त्याग करना चाहिए. अधिक मसालेदार और अधिक तैलीय युक्त भोजन से बचें. बसा भोजन न करें. ज़मीन पर नहीं सोना चाहिए. मूली और बैंगन का सेवन न करें. सावन के महीने में साग, हरी सब्जियों के सेवन से बचें. भादों में दही न खाएं वहीं आश्विन माह में दूध और कार्तिक माह में दालों का सेवन नहीं करना चाहिए. इसके अलावा शरीर पर तेल न लगाएँ और कांसे के बर्तनों में भोजन करने से बचना चाहिए. मांस और मदिरा का सेवन भी नहीं करना चाहिए.

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