श्रावण मास विशेष : बिल्वपत्र की महिमा

बिल्वपत्र की महिमा

बिल्ववृक्ष साक्षात् शंकररूप है। ब्रह्मा आदि देवता शक्ति प्राप्त करने के लिए बिल्ववृक्ष के नीचे आकर बैठते हैं। आशुतोष शिव को बिल्वपत्र कितना प्रिय है, इसका अनुमान इस कथानक से लगाया जा सकता है–एक व्याध (बहेलिया) शिकार के लिए वन में गया। शिकार कर लौटते समय थकान के कारण एक वृक्ष के नीचे सो गया। जागने पर उसने देखा कि रात्रि के घोर अंधकार के कारण घर लौटना असंभव है, अत: जंगली जानवरों के भय से वह एक वृक्ष के ऊपर जाकर बैठ गया। भाग्यवश उसदिन शिवरात्रि थी और जिस वृक्ष पर वह बैठा था, वह बिल्ववृक्ष था जिसकी जड़ में अति प्राचीन शिवलिंग था। सुबह शिकार के लिए जल्दी निकलने के कारण उसने कुछ खाया-पिया नहीं था। इससे उसका स्वाभाविक ही उपवास हो गया। सोने पर सुहागा तब हुआ जब वसन्त की रात्रि में ओस की बूंदों से भीगा एक बिल्वपत्र उसके अंगों से लगकर उस शिवलिंग पर जा गिरा। इससे आशुतोष शिव के तोष का पारावार न रहा। फलत: जीवन भर हिंसक कर्म करने के बावजूद उस व्याध को शिवलोक की प्राप्ति हुई।

बेलपत्रों द्वारा शिवजी का पूजन सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला और सम्पूर्ण दरिद्रता का नाश करने वाला है। बेलपत्र चढ़ाने का वही फल है जो एक कमलपुष्प चढ़ाने का है। बेलपत्र से बढ़कर शिवजी को प्रसन्न करने वाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है।जो मनुष्य ‘ॐ नम: शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र से अखण्ड बेलपत्रों द्वारा भगवान शिव का पूजन करता है, वह इस लोक में ऐश्वर्यवान होकर अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।बिल्ववृक्ष के दर्शन, स्पर्श और वंदन से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।अंत समय में मनुष्य के सारे शरीर में  बिल्ववृक्ष के मूल की मिट्टी लगा देने से व्यक्ति परमगति प्राप्त करता है।कृष्णपक्ष की अष्टमी को अखण्ड बेलपत्रों से भगवान शिव की पूजा करने पर ब्रह्महत्यादि पापों से छुटकारा मिल जाता है।बेलवृक्ष के नीचे बैठकर जो मनुष्य मंत्रजाप करता है, वह पुरश्चरण का (सवा लाख का) फल प्राप्त करता है और उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।बिल्ववृक्ष के मूल में जो मनुष्य दीपमालिका जलाता है वह तत्त्वज्ञान से पूर्ण (ज्ञानी) हो जाता है।बिल्ववृक्ष के मूल में किसी शिवभक्त को भोजन कराने से करोड़ों मनुष्यों को भोजन कराने का फल मिलता है।

विष्णुप्रिया लक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से प्रादुर्भूत हुआ बिल्ववृक्ष :

वृहद् धर्मपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा–इसके अनुसार बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति लक्ष्मीजी द्वारा स्तन काटकर चढ़ाने से हुई। लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए शिवजी का घोर आराधन व तप किया। अंत में लक्ष्मीजी ‘ॐ नम: शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र से एक सहस्त्र कमलपुष्प द्वारा शिवजी का पूजन कर रहीं थीं तब शिवजी ने उनकी परीक्षा करने के लिए एक कमलपुष्प चुरा लिया। भगवान विष्णु ने जब एक सहस्त्र पुष्पों से शिवजी की अर्चना की थी, उस समय भी भगवान शिवजी ने एक कमल चुरा लिया था–

सहस्त्र कमल पूजा उर धारी, कीन्ह परीक्षा तबहि पुरारी।

एक कमल प्रभु राखेहु जोई, कमल नयन पूजन चह सोई।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर, भए प्रसन्न दीन्ह इच्छित वर।

लक्ष्मीजी ने एक कमलपुष्प कम होने पर अपना बायां वक्ष:स्थल काटकर शिवजी पर चढ़ा दिया क्योंकि स्तन की उपमा कमल से की जाती है। जब लक्ष्मीजी अपना दायां वक्ष:स्थल भी काटने को उद्यत हुईं तब शिवजी प्रकट हो गए और लक्ष्मीजी से बोले–’तुम ऐसा मत करो, तुम समुद्र-तनया हो।’

“लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्। बिल्ववृक्षं  प्रयच्छामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।”

अर्थात्–बिल्ववृक्ष महालक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से उत्पन्न हुआ और महादेवजी का प्रिय है, मैं एक बिल्वपत्र शिवार्पण करता हूँ।

भगवान शिव आदि शल्यचिकित्सक हैं, उन्होंने गणेशजी को हाथी का और दक्षप्रजापति को बकरे का मुख लगाया था। अत: शिवकृपा से लक्ष्मीजी का बायां स्तन ज्यों-का-त्यों हो गया। शिवजी ने लक्ष्मीजी को वर देते हुए कहा–’समुद्र-तनये ! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। भगवान विष्णु तुम्हारा वरण करेंगे।’ लक्ष्मीजी ने कटे हुए स्तन को पृथ्वी में गाड़ दिया जिससे एक वृक्ष उत्पन्न हुआ। जिसके पत्तों में तीन दल हैं व गोल फल लगता है। बिल्वफल को ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी न पहचान सके। यह वृक्ष व इसका फल ब्रह्माजी की सृष्टि से परे है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया ‘अक्षय तृतीया’ को बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुई।

भगवान शिव ने प्रसन्न होकर लक्ष्मीजी से कहा–’बिल्ववृक्ष तुम्हारी भक्ति का प्रतीक होगा। यह वृक्ष मुझे व लक्ष्मीजी को अत्यन्त प्रिय होगा। हम दोनों की बिल्ववृक्ष से की गयी पूजा मुक्ता, प्रवाल, मूंगा, स्वर्ण, चांदी आदि रत्नों से की गयी पूजा से श्रेष्ठ मानी जाएगी। जैसे गंगाजल मुझको प्रिय है, उसी प्रकार बिल्वपत्र और बिल्वफल द्वारा की गयी मेरी पूजा कमल के समान मुझे प्रिय होगी। बिना बिल्वपत्र के मैं कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं करुंगा।’

“मणिमुक्त्ता प्रवालैस्तु रत्नैरप्यर्चनंकृतम् । नगृहणामि बिना देवि बिल्वपत्रैर्वरानने।।”

अग्निपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा–महर्षि भृगु की जो धेनु है, वही पृथ्वी पर गौ रूप में प्रकट हुई। उसी के गोबर से बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुई। उस बिल्ववृक्ष से ही श्री उत्पन्न हुईं। इसलिए बिल्वफल को श्रीफल भी कहा जाता है। श्रीलक्ष्मीजी की तपस्या के फलस्वरूप बिल्ववृक्ष हुआ।

“आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।।“(श्रीसूक्त, ऋग्वेद)

“अर्थात्– हे सूर्य के समान कान्ति वाली मां लक्ष्मी! वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिना फूल के फल देने वाला बिल्ववृक्ष तुम्हारे ही तप से उत्पन्न हुआ।उस बिल्व वृक्ष के फल हमारे बाहरी और भीतरी (मन व संसार के) दारिद्रय को दूर करें।”

दुर्लभ व चमत्कारी बेलपत्र:

जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्वपत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं। बिल्वपत्र में जितनी अधिक पत्तियां होती हैं, वह उतना ही अधिक उत्तम माना जाता है। तीन पत्तियों से अधिक पत्ते वाले बेलपत्र अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। चार पत्ती वाला बिल्वपत्र ब्रह्मा का रूप माना जाता है। पांच पत्ती वाला बेलपत्र शिवस्वरूप होता है व शिवकृपा से ही कभी-कभी प्राप्त होता है। छह से लेकर इक्कीस पत्तियों वाले बिल्वपत्र मुख्यतः नेपाल में पाए जाते हैं। इनका प्राप्त होना तो अत्यन्त ही दुर्लभ है।

 

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