श्रावण मास विशेष : रुद्राभिषेक से करें शि‍व जी को प्रसन्न,करेंगे हर इच्छा पूरी…………

हिंदु पंचांग के अनुसार सभी मासों को किसी न किसी देवता या देवी के साथ संबंधित देखा जा सकता है उसी प्रकार श्रावण मास को भगवान शिव जी के साथ देखा जाता है यह माह भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व होता है. भगवान शिव को श्रावण मास अत्यंत पसंद है क्यूंकि यह माह आशाओं की पुर्ति का समय होता है जिस प्रकार प्रकृति ग्रीष्म के थपेडों को सहती उई सावन की बौछारों से अपनी प्यास बुझाती हुई असीम तृप्ति एवं आनंद को पाती है उसी प्रकार प्राणियों की इच्छाओं को सूनेपन को दूर करने हेतु यह माह भक्ति और पूर्ति का अनुठा संगम दिखाता है ओर सभी की अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश करता है.

इस महीनें में गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, पंचाक्षर मंत्र इत्यादि शिव मंत्रों का जाप शुभ फलों में वृद्धि करने वाला होता है. श्रावण माह के समय भक्त शिवालय में स्थापित, प्राण-प्रतिष्ठित शिवलिंग या धातु से निर्मित लिंग का गंगाजल व दुग्ध से रुद्राभिषेक कराते हैं. शिवलिंग का रुद्राभिषेक भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है. इन दिनों शिवलिंग पर गंगा जल द्वारा अभिषेक करने से भगवान शिव अतिप्रसन्न होते हैं. इस श्रावण मास में शिव भक्त ज्योतिर्लिंगों का दर्शन एवं जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है तथा शिवलोक को पाता है. शास्त्रों में सावन के महात्म्य पर विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है. धर्म और आस्था का अटूट गठजोड़ हमें इस माह में दिखाई देता है इस माह की प्रत्येक तिथि किसी न किसी धार्मिक महत्व के साथ जुडी़ हुई होती है. इसका हर दिन व्रत और पूजा पाठ के लिए महत्वपूर्ण रहता है.

रुद्राभिषेक से करें शि‍व जी को प्रसन्न, करेंगे हर इच्छा पूरी

#रुद्राभिषेक कब होता है सबसे उत्तम ………………

कोई भी धार्मिक काम करने में समय और मुहूर्त का विशेष महत्व होता है. रुद्राभिषेक के लिए भी कुछ उत्तम योग बनते हैं. आइए जानते हैं कि कौन सा समय रुद्राभिषेक करने के लिए सबसे उत्तम होता है…

1. रुद्राभिषेक के लिए शिव जी की उपस्थिति देखना बहुत जरूरी है.

2. शिव जी का निवास देखे बिना कभी भी रुद्राभिषेक न करें, बुरा प्रभाव होता है.

3. शिव जी का निवास तभी देखें जब मनोकामना पूर्ति के लिए अभिषेक करना हो.

शिव जी का निवास कब मंगलकारी होता है………………………..

देवों के देव महादेव ब्रह्माण्ड में घूमते रहते हैं. महादेव कभी मां गौरी के साथ होते हैं तो कभी-कभी कैलाश पर विराजते हैं. ज्योतिषाचार्याओं की मानें तो रुद्राभिषेक तभी करना चाहिए जब शिव जी का निवास मंगलकारी हो…

  1. हर महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया और नवमी को शिव जी मां गौरी के साथ रहते हैं.
  2. हर महीने कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी और अमावस्या को भी शिव जी मां गौरी के साथ रहते हैं.
  3. कृष्ण पक्ष की चतुर्थी और एकादशी को महादेव कैलाश पर वास करते हैं.
  4. शुक्ल पक्ष की पंचमी और द्वादशी तिथि को भी महादेव कैलाश पर ही रहते हैं.
  5. कृष्ण पक्ष की पंचमी और द्वादशी को शिव जी नंदी पर सवार होकर पूरा विश्व भ्रमण करते हैं.
  6. शुक्ल पक्ष की षष्ठी और तिथि को भी शिव जी विश्व भ्रमण पर होते हैं.
  7. रुद्राभिषेक के लिए इन तिथियों में महादेव का निवास मंगलकारी होता है.

 

शिव जी का निवास कब”अनिष्टकारी” होता है……………………………..

  1. शिव आराधना का सबसे उत्तम तरीका है रुद्राभिषेक लेकिन रुद्राभिषेक करने से पहले शिव के अनिष्‍टकारी निवास का ध्यान रखना बहुत जरूरी है…
  2. कृष्णपक्ष की सप्तमी और चतुर्दशी को भगवान शिव””” श्मशान “””में समाधि में रहते हैं.
  3. शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी और पूर्णिमा को भी शिव श्मशान में समाधि में रहते हैं.
  4. कृष्ण पक्ष की द्वितीया और नवमी को महादेव देवताओं की समस्याएं सुनते हैं.
  5. शुक्लपक्ष की तृतीया और दशमी में भी महादेव देवताओं की समस्याएं सुनते हैं.
  6. कृष्णपक्ष की तृतीया और दशमी को नटराज क्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं.
  7. शुक्लपक्ष की चतुर्थी और एकादशी को भी नटराज क्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं.
  8. कृष्णपक्ष की षष्ठी और त्रयोदशी को रुद्र भोजन करते हैं.
  9. शुक्लपक्ष की सप्तमी और चतुर्दशी को भी रुद्र भोजन करते हैं.
  10. इन तिथियों में मनोकामना पूर्ति के लिए अभिषेक नहीं किया जा सकता है.

रुद्राभिषेक के लिए कब तिथियों का विचार नहीं किया जाता……………………..

  • शिवरात्री, प्रदोष और सावन के सोमवार  को शिव के निवास पर विचार नहीं करते.
  • सिद्ध पीठ या ज्योतिर्लिंग के क्षेत्र में भी शिव के निवास पर विचार नहीं करते.

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू……………………..

श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै । दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा । पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना । जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम् । तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम । केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत् । श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह । पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै । पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा । कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।।

अर्थात

  • जल से रुद्राभिषेक करने पर —               वृष्टि होती है।
  • कुशा जल से अभिषेक करने पर —        रोग, दुःख से छुटकारा मिलती है।
  • दही से अभिषेक करने पर —                  पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
  • गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर —     लक्ष्मी प्राप्ति होती है।
  • मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि के लिए।
  • तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर —     मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • इत्र मिले जल से अभिषेक करने से —     बीमारी नष्ट होती है ।
  • दूध् से अभिषेककरने से   —              पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण
  • गंगाजल से अभिषेक करने से —             ज्वर ठीक हो जाता है।
  • दूध् शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति हेतू।
  • घी से अभिषेक करने से —                       वंश विस्तार होती है।
  • सरसों के तेल से अभिषेक करने से —      रोग तथा शत्रु का नाश होता है।
  • शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से   —-         पाप क्षय हेतू।

 

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद सेसमृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाते हैं।

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