राजस्थानी साहित्य में ज्योतिष दोहे

    राजस्थानी साहित्य में ज्योतिष दोहे


आप सभी ने आज तक ज्योतिष को संस्कृत और हिंदी में ही पढ़ा और समझा है! आज हम आपको ज्योतिष दोहों से अवगत कराएंगे जो की राजस्थानी भाषा में राजस्थानी कवियों द्वारा लिखित है !

    राजस्थानी में नवग्रह – शांति दोहा

सूरज चंदा भौम बुध , गुरु शुक्र शनि देव ।
सब ही जान किरपा करो नित उठ करता सेव ।।
राहु – केतु किरपा करो धरहु आपरो ध्यान ।
भैरु चौसठ योगिनी पीर वीर हनुमान।।
जती सती और सूरमा अरु बस्ती का देव ।
मनसा पूर्ण कीजिये रती न आवे खेव ।।

राजस्थानी कवियों ने ज्योतिष में संस्कृत के जटिल से जटिल ज्ञान को जनहित के लिए सरल से सरलतम कर दिया है !
जिसके कारन अब ज्योतिष को सीखना एवं पढ़ना लोगो के लिए बहुत ही सरल बन गया है, अब लोग भी ज्योतिष में अपनी रूचि अत्यधिक प्रकट कर रहे है !
एक उदहारण के तौर पर राजस्थानी दोहा द्वारा ज्योतिष में तिथियों का स्वरुप :

एक छठी एकादशी या नंदा तिथि जाण ।
दोयज सातें द्वादशी भद्रा लीजै मान ।।
तीज अष्टमी त्रयोदशी जया तिथि है तीन ।
चौदस नौमी चतुर्थी रिक्त तिथि प्रवीन ।।
दसवीं पुण्युं (पूर्णिमा) पंचमी मावस पूरण होय ।
‘मोती’ सोधि विचार कर कारज करियो कोय ।।

अनुवाद इस प्रकार है
यदि एकम,छठी और एकादशी – नंदा तिथि रविवार या मंगलवार के दिन हो ,
दूज,सप्तम और द्वादशी – भद्रा तिथि बुधवार या शुक्रवार को हो,
तृतीया,अष्टमी और त्रयोदशी – जया तिथि बुधवार को हो,
चतुर्थी , नवमी और चौदस – रिक्ता तिथि गुरुवार को हो एवं,
पंचमी ,दशमी और पूर्णिमा – पूर्णा तिथि शनिवार को हो,तो मृत्युयोग होता है!अतः इन तिथियों और वारो में सोच विचार कर ही कार्य करना चाहिए!

राजस्थानी कवि ने इस दोहे के माध्यम से सारे अच्छे मुहूर्त का वर्णन बड़ी सरलता से कर दिया है…….
कवि लिखता है कि,
” पूनम कि पड़वा भली अर, अमावस कि बीज ।
ाण बूझ्या मुहूर्त भला है, तेरस कै तीज ।।”

अर्थात पूर्णिमा के बाद आनेवाली पड़वा(प्रथमा) , तेरस (त्रयोदशी) और तीज (तृतीया) तथा अमावस्या के पश्चात शुक्लल पक्ष कि द्वितीया- यह दिन अनबुझे मुहूर्त होते है और इन दिनों में जो भी कार्य शुरू किया जाता है ,उनमे सफलता मिलती है !

कवि ने इस दोहे के माध्यम से सारे यात्रा मुहूर्त का वर्णन बड़ी सरलता से कर दिया है…….
“पूरब सोम शनैशर वासो , दक्षिण गुरु एकलो निवासो
भौम और बुध उत्तर जानो , शुक्र -रवि पश्चिम ठानो “

अर्थात सोमवार और शनिवार को पूरब दिशा कि यात्रा,
गुरुवार को दक्षिण दिशा कि यात्रा औऱ ,
मंगलवार और बुधवार को उत्तर दिशा एवं , शुक्र – रविवार को पश्चिम दिशा कि यात्रा नेष्टकारी औऱ अमंगलकारी होती है !

दिशाशूल विचार यात्रा करने से पहले जरूर जान लें – दिशाशूल।

दिशाशूल के ऊपर एक पुरानी कहावत है।
सोम शनीचर पूरब न चालू। मंगल बुध उत्तर दिश कालू।
रवि शुक्र जो पश्चिम जाय। हानि होय पथ सुख नहीं पाए।
बीफे दक्खिन करे पयाना। फिर नहिं समझो ताको आना।

यात्रा विचार अर्थात
१ सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिए।
२ मंगलवार और बुधवार को उत्तर दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिए।
३ रविवार और शुक्रवार को पश्चिम दिशा दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिए।
४ वीरवार या बृहस्पति को दक्षिण दिशा की और यात्रा करना बहुत ही खतरनाक होता है।

परन्तु अगर किसी विशेष कारण या बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य हेतु इन वारो को इन निषेध दिशा कि यात्रा करनी पड जावे तो इसके दिशाशूल के परिहार या इसके दोष को दूर करने के लिए किस वास्तु का सेवन कर के यात्रा आरम्भ करनी चाहिए
राजस्थानी दोहा :
घी खयार इतवार ने , सोमवार पय ( गाय का दूध ) शुद्ध ।
गुड़ खाय मंगलवार ने, टिल खाय रे बुध ।।
दही खायर गुरु ने , अर शुक्रवार जौ खाय ।
उड़द खयार शनि ने चलो शूल दोष मिट जाये ।।
अर्थात दिशाशूल के दोषो से मुक्ति पाने के लिए कवि कहता है कि
रविवार को घी का सेवन करके,
सोमवार को दूध का सेवन करके,
गुड़ का सेवन मंगलवार को,
तिल का प्रयोग बुध को,
दही का सेवन गुरुवार को,
जौ खाय शुक्रवार औऱ
उड़द का प्रयोग शनिवार के दिन कि जाये तो यात्रा से होने वाली नुक्सान से हम बच सकते है !

यात्रा करने से पहले इन वस्तुओं का भी प्रयोग कर सकते है।
“रवि को पान, सोम को दर्पण, मंगल गुड़ करिए अर्पण ।
बुद्ध को धनिया, बिफै जीरा, शुक्र कहे मोहे दधि का पीरा।
कहे सनी में अदरख पावा ,सुख संपति निश्चय घर लावा।”

1 रविवार को पान खाकर यात्रा करनी चाहिए।
2 सोमवार को शीशे में मुंह देखकर यात्रा करनी चाहिए।
3 मंगलवार को गुड़ खाकर यात्रा करनी चाहिए।
4 बुधवार को धनिया खाकर के यात्रा करनी चाहिए।
5 गुरुवार को जीरा खाना चाहिए।
6 शुक्रवार को दही खाकर यात्रा करनी चाहिए और शनिवार को अदरख खा कर के यात्रा करने से सभी कार्य सफल होते हैं।

दोहे द्वारा कवि यात्रा से पूर्व दिखने शुभ और अशुभ संकेत के बारे में चर्चा कर रहा है, वे इस प्रकार है…

भैंसा खर लड़ता मग माही ।
स्वान बिलाई द्वन्द मचाई ।।
विधवा नारी उबासी लैवे।
कुत्तो कान फड़फड़ी देवे ।।
रोगी रीछ सवार सदा ही ।
दाएं – बाएं हैं दुखदायी ।।
इकली हिरणी दूजो स्यालो ।
भैसं चढ्यो मत मिलजो ग्वालो ।।
तीन कोस तक मिल जावे तेली ।
निश्चय मौत शीश पर खेली ।।
सुका लक्कड़ दूध अंगारा ।
सुने माथे विप्र भिखारा।।

अनुवाद इस प्रकार है,अगर यात्रा पर जाने से पूर्व अगर यह संकेत होना जैसी कि
भैंसा मिटटी या घास में अपने सिंघों को रगड़ता है,
कुत्ता और बिल्ली के रूदन का स्वर सुनाई दे,
विधवा नारी उबासी लेते नज़र आवे,
कुत्ता कानो को फड़फड़ आये,रोगी और भालू का दिखना बड़ा ही कष्टकारक होता है !
अगर तीन कोस अर्थात ९ किलोमीटर से १२ किलोमीटर तक अगर कोई तेली (मतलब तेल को निकालने वाला) दिखाई दे जावे तो मृत्यु सामान कष्ट कहा गया है ! इन सभी का सामने पड़ना अथवा दिखाई देना बुरा और अशुभ मन कहा गया है !

परन्तु इस के विपरीत यात्रा में रवाना होते वक़्त दाहिनी ऒर कोचरी पक्षी बोलती मिल जाय या बाये तरफ तीतर बोलता नज़र आए या नीलकंठ पक्षी मिल जाये तो जिस उद्देश्य से यात्रा कि जा रही है ,वह अवश्य सिद्ध होगी या फलदायिनी होती है अर्थात किंचित भी संचय नहीं होता है !

अनेक योगो का वर्णन :

    १ उषा सोम दिति अनुराधा, बुद्धश्वानि गुरु ने मृगसिर ।
    भौम शतभिषा मौत शोग है , शुक्रा ाखलेखा हस्त शनिचर ।।
    अर्थात सोमवार को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र होव,रविवार को अनुराधा नक्षत्र, बुधवार को अश्वनी नक्षत्र , गुरुवार को मृगशिरा , मंगल होय शतभिषा नक्षत्र ,शुक्रवार को अश्लेषा औऱ शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो मृत्युयोग होता है , अतः इन दिन औऱ नक्षत्र में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!
    २ रवि ने हस्त पुख हो गुरु ने बुध अनुराध अश्वनी भौम ।
    अमृतसिद्धि रेवती भृगु ने मंद रोहिणी मृगसिर सोम ।।
    अर्थात रविवार को हस्त नक्षत्र हो , गुरुवार को पुष्य नक्षत्र हो, बुधवार को अनुराधा नक्षत्र हो,मंगलवार को अश्वनी नक्षत्र ,शुक्रवार को रेवती नक्षत्र .शनिवार रोहिणी नक्षत्र हो औऱ सोमवार के दिन मृगशिरा नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग जाने, जो भी कार्य इस योग में किया जाता है वह बहुत ही फलदायिनी होते है !
    ३ पड़वा मूलक पांचा भरनी । आठें कृतिका नौमी रोहिणी ।।
    दशमी असलेखा सुन लो भैया । ये योग ज्वालामुखी कहिया ।।
    अर्थात पड़वा को मूलनक्षत्र ,पंचमी को भरनी नक्षत्र हो ,
    अष्टमी को कृतिका , नवमी को रोहिणी नक्षत्र औऱ दशमी को अश्लेषा नक्षत्र हो तो ये योग ज्वालामुखी योग होय,इनमे जन्मा जातक जीवित नहीं रहता या मृत्युतुल्य कष्ट भोगना पड़ता है !

    परन्तु बड़े दुःख कि बात है कि वैज्ञानिक औऱ मॉडर्न युग में ये बातें बेतुकी सी समझी जातीं है, परन्तु गावँ के लोग आज भी इस धरोहर को संजोक के रखे हुए है अर्थात आज भी यह बातें बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जातीं है , इनमे विश्वास रखते है !

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