गुरु-पुर्णिमा पर्व का महत्व

गुरु पुर्णिमा पर्व का महत्व: –

जीवन में गुरु और शिक्षक के महत्व को आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए यह पर्व आदर्श है ! गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण एवं सम्मान का पर्व है “गुरु पूर्णिमा”। प्राचीन काल में विद्यार्थी आश्रम में रहकर अपने गुरु से शिक्षा प्राप्त करते थे एवं गुरु यह शिक्षा निःशुल्क प्रदान किया करते थे। अतः गुरु पूर्णिमा के दिन सभी शिष्य श्रद्धा भाव से अभिभूत हो कर गुरु की वंदना करते थे एवं गुरु को दक्षिणा दिया करते थे। यह दक्षिणा साधारणतः सामर्थ्यनुसार प्रदान किया जाता था परन्तु इतिहास साक्षी है की शिष्य अपने गुरु के मुँह से निकली हुई हर बात को आदेश मानते थे एवं कुछ भी दक्षिणा प्रदान करने से पीछे नहीं हटते थे। इसका सबसे बड़ा उदहारण एकलव्य हैं जिन्होंने गुरु के कहने मात्र से अपना अँगूठा काट कर उन्हें भेंट कर दिया था।

परन्तु,आधुनिक काल की बात करें तो अब शिष्य ना तो आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं और ना ही गुरु उनसे प्राचीन काल जैसी दक्षिणा की अपेक्षा रखते हैं परन्तु आज भी गुरु का महत्व कम नहीं हुआ है और शिक्षा प्रदान करने वाले गुरु के सम्मान में शिष्य आज भी कई तरह से अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन करते हैं।

गुरु का जीवन में महत्त्व: –

गुरु का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान) एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश (ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु को ब्रह्मा कहा गया है, क्योंकि गुरु ही अपने शिष्य को नया जन्म देता है| गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है। हमारे हृदय में अज्ञानता रुपी अन्धकार को दूर करते है, गुरु। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। हमारे भावी जीवन का निर्माण गुरू द्वारा ही होता है।

गुरु का हमारे जीवन में कितना महत्व है, इसको बताने के लिए एक प्रसंग प्रस्तुत है………

एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए ! भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो ! जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो ! भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है ! यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !

नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ? यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !

मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !

यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !

नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया ! नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है !

 ” गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास, गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !”

गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा “स्वयं गुरु” भी नहीं कर सकते !

गुरु पूर्णिमा आषाढ माह की पूर्णिमा को क्यों मनाई जाती है ?

गुरु पूर्णिमा का एकमात्र उद्देश्य है गुरु को सम्मान प्रदान करना पर गुरु को नमन करने के लिए आषाढ़ पूर्णिमा का ही दिन क्यों निश्चित किया गया है, इस विषय में कुछ प्रचलित मान्यताओं को यहाँ बताने का प्रयास किया गया है।

गुरु पूर्णिमा के लिए आषाढ़ माह की पूर्णिमा को चुनने के पीछे गहरा अर्थ है. अर्थ है कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह. आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादल रूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों. शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं. वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं. उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है. इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है!

माना जाता है कि जैसे सूर्य के ताप से तप्ती हुई भूमि को वर्षा के जल से शीतलता और फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उज्जवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते। गुरू पूर्णिमा का चंद्रमा बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है। शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है। जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है।

मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महाभारत के रचयिता, श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास जिन्हें हम श्री वेद व्यास के नाम से जानते हैं, का जन्म हुआ था। इसी कारणवश गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है !

इसी दिन यानि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन वेद व्यास जी ने हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ ‘वेद’ को चार भागों में विभाजित किया था। चरों वेदों अर्थात ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद की व्याख्या भी वेद व्यास जी द्वारा की गयी थी। चार भागों में विभाजित होने के बाद आम आदमी के लिए वेदों को समझना बहुत आसान हो गया। इस कारण से वेद व्यास जी को सर्वोच्च गुरु कह कर बुलाया गया और उनके सम्मान में इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। प्रत्येक गुरु में गुरु वेद व्यास का अंश मान कर हम अपने गुरुओं की पूजा गुरु पूर्णिमा के दिन करने लगे। बुद्ध धर्म को मानने वाले लोग भी गुरु पूर्णिमा मनाते हैं। माना जाता है कि इसी दिन बुद्ध भगवान् ने अपना पहला प्रवचन सारनाथ में दिया था जो कि उत्तर प्रदेश में स्थित है।

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है. भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे,जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी ! इसीलिए व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा अंधविश्वास के आधार पर नहीं बल्कि श्रद्धाभाव से मनाना चाहिए!

 

गुरु पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है ?

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरुओं को सम्मानित किया जाता है। इस अवसर पर आश्रमों में पूजा-पाठ का विशेष आयोजन किया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातः काल स्नानादि करके शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरु के पास जाना चाहिए। उन्हें ऊंचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर तथा धन भेंट करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजन करने से ततपश्चात गुरु का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है ! क्यूंकि गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। गुरु की पूजा के बाद साधू सन्यासियों की भी पूजा की जाती है एवं श्रद्धा भाव से उन्हें भोजन कराया जाता है।

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल से ही मंदिरों में एवं आध्यात्मिक आश्रमों में सत्संग होते हैं एवं गुरु की महिमा का व्याख्यान किया जाता है। पूरे दिन मंदिरों एवं आश्रमों में भजन कीर्तन किया जाता है एवं गुरु की महिमा गान कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

घरों में, मंदिरों में एवं आश्रमों में गुरु वेद व्यास की पूजा की जाती है। वेद व्यास गुरु के साथ साथ अन्य गुरु स्वरुप इष्टदेवों की भी पूजा की जाती है। ब्रह्म भगवान, कृष्ण भगवान् , शिर्डी साईंबाबा के साथ साथ आदि शंकराचार्य, श्री रामानुजाचार्य, माधवाचार्य एवं अन्य हिन्दू गुरुओं की पूजा भी की जाती है।

जो लोग धार्मिक पूजा पाठ नहीं करना चाहते वे भी अपने गुरुओं को अलग अलग प्रकार से सम्मानित करते हैं। कुछ लोग अपने गुरु की लिखी हुई किताबें पढ़ते हैं तथा औरों को भी गुरु के ज्ञान से अवगत कराते हैं। कई लोग अपने गुरु का ध्यान करते हैं और शांत मन से उनकी दी हुई शिक्षा का मनन चिंतन करते हैं एवं किस तरह से उन शिक्षाओं को जीवन में उतार कर व्यवहारिक रूप से अपनाया जाए इस पर भी चिंतन करते हैं।

साथ ही इस पर्व पर विभिन्न क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले विभूतियों को सम्मानित किया जाता है। सम्मानित लोगों में साहित्य, संगीत, नाट्य विद्या, चित्रकला आदि क्षेत्रों के लोग शामिल होते हैं। कई जगह कथा, कीर्तन एवं भंडारा का आयोजन किया जाता है। इस दिन गुरु के नाम पर दान-पुण्य करने का भी प्राविधान है।

गुरु ध्यान

मालाकमण्डलुरधः करपद्मयुग्मे । मध्यस्थपाणियुगले डमरू-त्रिशूले ।

यस्यास्ति ऊर्ध्वकरयोः शुभशंखचक्रे ।वन्दे तमत्रिवरदं भुजषट्‍कयुक्तम् ॥

औदुंबरः कल्पवृक्षः कामधेनुश्च संगमः । चिंतामणीः गुरोः पादौ दुर्लभो भुवनत्रये ।

कृत जनार्दनो देवस्त्रेत्रायां रघुनन्दनः ।द्वापारे रामकृष्णौ च कलौ श्रीपाद-श्रीवल्लभः ॥

ब्रह्मानंद्म परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् ।द्वंद्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ॥

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीः साक्षिभूतम् । भावातीतं त्रिगुनरहितं सद्‍गुरुं तं नमामि ॥

काषायवस्त्रं करदंदधारिणं । कमंडलुं पद्मकरेण शंखम् ॥

चक्रं गदाभूषितभूषणाढ्यं । श्रीपादराजं शरणं प्रपद्ये ॥

 

गुरु वंदना

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किंचित्सचराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

चिन्मयं व्यापियत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

त्सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजित पदाम्बुजः ।
वेदान्ताम्बुजसूर्योयः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

चैतन्यः शाश्वतःशान्तो व्योमातीतो निरंजनः ।
बिन्दुनाद कलातीतः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः ।
भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अनेकजन्मसंप्राप्त कर्मबन्धविदाहिने ।
आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापणं सारसंपदः ।
गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ।
तत्त्वज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः ।
मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम् ।
गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

 

गुरु पूर्णिमा हमारे लिए तभी सार्थक हो सकती है जब हम गुरु से प्राप्त शिक्षा को अपने जीवन में उतारें। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की एवं उनकी दी हुई शिक्षा को याद कर बाकी दिन उन्ही शिक्षाओं के अनुसार जीवन में व्यवहार करें तभी गुरु पूर्णिमा का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है।

 

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