गुप्त नवरात्रि : प्रथम महाविद्या जगज्जननी माँ काली

जगज्जननी महाविद्या ने फाल्गुन शुक्ला द्वादशी को त्रैलोक्य-मोहिनी शक्ति के रूप में दुष्‍टों का संहार करने एवं धर्म की रक्षा और पुनःस्थापना के लिए मां ने काली का यह रूप धरा था ! मां दुर्गा का विकराल स्वरूप ही हैं मां काली ! ‘काली’ शब्द से अभिप्राय है समय और काल। काल, जो सभी को अपने में समा लेता है। मां काली भयानक अंधकार और श्मशान की अधिष्ठात्री देवी है ।  मां काली बल और शक्ति की देवी हैं। मां काली को देवी दुर्गा की 10 महाविद्याओं में से एक माना जाता है।

माँ काली स्वरुप : कालरात्रि माता गले में विदूयत की  माला धारण करती हैं। इनके बाल खुले हुए हैं और गर्दभ की सवारी करती हैं, जबकि मां काली नरमुंड की माला पहनती हैं और हाथ में खप्पर और तलवार लेकर चलती हैं। काली माता के हाथ में कटा हुआ सिर है जिससे रक्त टपकता रहता है। भयंकर रूप होते हुए भी माता भक्तों के लिए कल्याणकारी हैं। कालरात्रि माता को काली और शुभंकरी भी कहा जाता है।

महाकाली की उत्पत्ति कथा : माँ के इस स्वरुप के पीछे विभ्भिन कथा प्रचलित है,आइए जानें

1.श्रीमार्कण्डेय पुराण एवं श्रीदुर्गा सप्तशती के अनुसार उनके काली रूप में अवतार की कथा इस प्रकार है-

काली मां की उत्पत्ति जगत जननी मां अम्बा के ललाट से हुई थी। कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों के आतंक का प्रकोप इस कदर बढ़ चुका था कि उन्होंने अपने बल, छल एवं महाबली असुरों द्वारा देवराज इन्द्र सहित अन्य समस्त देवतागणों को निष्कासित कर स्वयं उनके स्थान पर आकर उन्हें प्राणरक्षा हेतु भटकने के लिए छोड़ दिया। दैत्यों द्वारा आतंकित देवों को ध्यान आया कि महिषासुर के इन्द्रपुरी पर अधिकार कर लिया है, तब दुर्गा ने ही उनकी मदद की थी। तब वे सभी दुर्गा का आह्वान करने लगे।

उनके इस प्रकार आह्वान से देवी प्रकट हुईं एवं शुम्भ-निशुम्भ के अति शक्तिशाली असुर चंड तथा मुंड दोनों का एक घमासान युद्ध में नाश कर दिया। चंड-मुंड के इस प्रकार मारे जाने एवं अपनी बहुत सारी सेना का संहार हो जाने पर दैत्यराज शुम्भ ने अत्यधिक क्रोधित होकर अपनी संपूर्ण सेना को युद्ध में जाने की आज्ञा दी तथा कहा कि आज छियासी उदायुद्ध नामक दैत्य सेनापति एवं कम्बु दैत्य के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से  घिरे युद्ध के लिए प्रस्थान करें। कोटिवीर्य कुल के पचास, धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति मेरे आदेश पर सेना एवं कालक, दौर्हृद, मौर्य व कालकेय असुरों सहित युद्ध के लिए कूच करें।  अत्यंत क्रूर दुष्टाचारी असुर राज शुंभ अपने साथ सहस्र असुरों वाली महासेना लेकर चल पड़ा।

उसकी भयानक दैत्यसेना को युद्धस्थल में आता देखकर देवी ने अपने धनुष से ऐसी टंकार दी कि उसकी आवाज से आकाश व समस्त पृथ्वी गूंज उठी। पहाड़ों में दरारें पड़ गईं। देवी के सिंह ने भी दहाड़ना प्रारंभ किया, फिर जगदम्बिका ने घंटे के स्वर से उस आवाज को दुगना बढ़ा दिया। धनुष, सिंह एवं घंटे की ध्वनि से  समस्त दिशाएं गूंज उठीं। भयंकर नाद को सुनकर असुर सेना ने देवी के सिंह को और मां काली को चारों ओर से घेर लिया। तदनंतर असुरों के संहार एवं देवगणों के कष्ट निवारण हेतु परमपिता ब्रह्माजी, विष्णु, महेश,कार्तिकेय, इन्द्रादि देवों की शक्तियों ने रूप धारण कर लिए एवं समस्त देवों के शरीर से अनंत शक्तियां निकलकर अपने पराक्रम एवं बल के साथ मां दुर्गा के पास पहुंचीं।  तत्पश्चात समस्त शक्तियों से घिरे शिवजी ने देवी जगदम्बा से कहा- ‘मेरी प्रसन्नता हेतु तुम इस समस्त दानव दलों का सर्वनाश करो।’ तब देवी जगदम्बा के शरीर से भयानक उग्र रूप धारण किए चंडिका देवी शक्ति रूप में प्रकट हुईं। उनके स्वर में सैकड़ों गीदड़ों की भांति आवाज आती थी।

असुरराज शुम्भ-निशुम्भ क्रोध से भर उठे। वे देवी कात्यायनी की ओर युद्ध हेतु बढ़े। अत्यंत क्रोध में चूर उन्होंने देवी पर बाण, शक्ति, शूल, फरसा, ऋषि आदि अस्त्रों-शस्त्रों द्वारा प्रहार प्रारंभ किया। देवी ने अपने धनुष से टंकार की एवं अपने बाणों द्वारा उनके समस्त अस्त्रों-शस्त्रों को काट डाला, जो उनकी ओर बढ़ रहे थे।मां काली फिर उनके आगे-आगे शत्रुओं को अपने शूलादि के प्रहार द्वारा विदीर्ण करती हुई व खट्वांग से कुचलती हुईं समस्त युद्धभूमि में विचरने लगीं। सभी राक्षसों चंड मुंडादि को मारने के बाद उसने रक्तबीज को भी  मार दिया।

शक्ति का यह अवतार एक रक्तबीज नामक राक्षस को मारने के लिए हुआ था। फिर शुम्भ-निशुंभ का वध करने के बाद बाद भी जब काली मां का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तब उनके गुस्से को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्ते में लेट गए और काली मां का पैर उनके सीने पर पड़ गया। शिव पर पैर रखते ही माता का क्रोध शांत होने लगा।

2.शिव पुराण के अनुसार उनके काली रूप में अवतार की कथा इस प्रकार है-

प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् के जलमग्न होने पर भगवान विष्णु योगनिद्रा में शेषशय्या पर शयन कर रहे थे। उन्हीं दिनों भगवान विष्णु के कानों के मल से दो असुर प्रलयकाल के सूर्य की भाँति तेजस्वी थे। उनके जबड़े बहुत बड़े थे। उनके मुख दाढ़ों के कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण विश्व को खा डालने के लिये उद्यम हों। उन दोनों ने भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के ऊपर विराजमान ब्रह्मा जी को मारने के लिये तैयार हो गये।

ब्रह्माजी ने देखा कि ये दोनों मेरे ऊपर आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान विष्णु समुद्र के जल में शेषशय्या पर सो रहे हैं, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिये महामाया परमेश्वरी की स्तुति की और उनसे प्रार्थना किया- ‘अम्बिके! तुम इन दोनों असुरों को मोहित करके मेरी रक्षा करो और अजन्मा भगवान नारायण को जगा दो।’

मधु और कैटभ के नाश के लिये ब्रह्मा जी के प्रार्थना करने पर सम्पूर्ण विद्याओं की अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या काली फाल्गुन शुक्ला द्वादशी को त्रैलोक्य-मोहिनी शक्ति के रूप में पहले आकाश में प्रकट हुईं। तदनन्तर आकाशवाणी हुई ‘कमलासन ब्रह्मा डरो मत। युद्ध में मधु-कैटभ का विनाश करके मैं तुम्हारे संकट दूर करूँगी।’ फिर वे महामाया भगवान श्रीहरि के नेत्र, मुख, नासिका और बाहु आदि से निकल कर ब्रह्मा जी के सामने आ खड़ी हुईं। उसी समय भगवान विष्णु भी योगनिद्रा से जग गये। फिर देवाधिदेव भगवान् विष्णु ने अपने सामने मधु और कैटभ दोनों दैत्यों को देखा। उन दोनों महादैत्यों के साथ अतुल तेजस्वी भगवान विष्णु का पाँच हज़ार वर्षों तक घोर युद्ध हुआ। अन्त में महामाया के प्रभाव से मोहित होकर उन असुरों ने भगवान विष्णु से कहा कि ‘हम तुम्हारे युद्ध से अत्यन्त प्रभावित हुए। तुम हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँग लो।’

भगवान विष्णु ने कहा- ‘यदि तुम लोग मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों से हो।’ उन असुरों ने देखा कि सारी पृथ्वी एकार्णव जल में डूबी है। यदि हम सूखी धरती पर अपने मृत्यु का वरदान इन्हें देते हैं, तब यह चाह कर भी हम को नहीं मार पायेंगे और हमें वरदान देने का श्रेय भी प्राप्त हो जायेगा। अत: उन दोनों ने भगवान विष्णु से कहा कि ‘तुम हमको ऐसी जगह मार सकते हो, जहाँ जल से भीगी हुई धरती न हो।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् विष्णु ने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघ पर उनके मस्तकों को रखकर काट डाला। इस प्रकार भगवती महाकाली की कृपा से उन दैत्यों की बुद्धि भ्रमित हो जाने से उनका अन्त हुआ !

माँ काली के विभ्भिन अचूक मंत्र,स्त्रोत एवं कवच श्रृंखला:

माँ काली के विभ्भिन अचूक मंत्र,स्त्रोत एवं कवच प्रस्तुत्त कर रहे है। इन स्त्रोतो एवं मंत्रो और अनुष्ठान के करने से माता की विशेष कृपा मिलती है,लेकिन आपको इसके लिए विशेष सावधान रहने की जरूरत है क्यूंकि यह मंत्र और स्त्रोत काफी उग्र और काफी प्रभावशाली है प्रायः किसी गुरु या सिद्ध पुरुष की छत्र-छाया में रह कर ही करे और यदि आप काली के भक्त हैं तो ही करें।

1. ॥ वैरिनाशनं कालिकाकवचम् ॥

श्रीगणेशाय नमः 

कैलासशिखरासीनं देवदेवं जगद्गुरुम् । शङ्करं परिपप्रच्छ पार्वती परमेश्वरम् ॥ १॥

कैलासशिखरारूढं शङ्करं वरदं शिवम् । देवी पप्रच्छ सर्वज्ञं सर्वदेव महेश्वरम् ॥ १॥

पार्वत्युवाच

भगवन् देवदेवेश देवानां भोगद प्रभो । प्रब्रूहि मे महादेव गोप्यं चेद्यदि हे प्रभो ॥ २॥

शत्रूणां येन नाशः स्यादात्मनो रक्षणं भवेत् । परमैश्वर्यमतुलं लभेद्येन हि तद्वद ॥ ३॥

भैरव उवाच

वक्ष्यामि ते महादेवि सर्वधर्मविदां वरे । अद्भुतं कवचं देव्याः सर्वकामप्रसाधकम् ॥ ४॥

विशेषतः शत्रुनाशं सर्वरक्षाकरं नृणाम् । सर्वारिष्टप्रशमनं सर्वाभद्रविनाशनम् ॥ ५॥

सुखदं भोगदं चैव वशीकरणमुत्तमम् । शत्रुसंघाः क्षयं यान्ति भवन्ति व्याधिपीडिअताः ॥ ६॥

दुःखिनो ज्वरिणश्चैव स्वाभीष्टद्रोहिणस्तथा । भोगमोक्षप्रदं चैव कालिकाकवचं पठेत् ॥ ७॥

श्रीकालिकाकवचस्य विनियोगः

ॐ अस्य श्रीकालिकाकवचस्य भैरव ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीकालिका देवता । शत्रुसंहारार्थ जपे विनियोगः ।

ध्यानम्

ॐ ध्यायेत्कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम् ।

चतुर्भुजां ललज्जिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ८॥

नीलोत्पलदलश्यामां शत्रुसंघविदारिणीम् ।

नरमुण्डं तथा खड्गं कमलं च वरं तथा ॥ ९॥

निर्भयां रक्तवदनां दंष्ट्रालीघोररूपिणीम् ।

साट्टहासाननां देवीं सर्वदां च दिगम्बरीम् ॥ १०॥

शवासनस्थितां कालीं मुण्डमालाविभूषिताम् ।

इति ध्यात्वा महाकालीं ततस्तु कवचं पठेत् ॥ ११॥

कवच 

ॐ कालिका घोररूपा सर्वकामप्रदा शुभा ।सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ॥ १२॥

ॐ ह्रीं ह्रींरूपिणीं चैव ह्रां ह्रीं ह्रांरूपिणीं तथा । ह्रां ह्रीं क्षों क्षौंस्वरूपा सा सदा शत्रून्विदारयेत् ॥ १३॥

श्रीं-ह्रीं ऐंरूपिणी देवी भवबन्धविमोचनी । हुंरूपिणी महाकाली रक्षास्मान् देवि सर्वदा ॥ १४॥

यया शुम्भो हतो दैत्यो निशुम्भश्च महासुरः । वैरिनाशाय वन्दे तां कालिकां शङ्करप्रियाम् ॥ १५॥

ब्राह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नारसिंहिका । कौमार्यैन्द्री च चामुण्डा खादन्तु मम विद्विषः ॥ १६॥

सुरेश्वरी घोररूपा चण्डमुण्डविनाशिनी । मुण्डमालावृताङ्गी च सर्वतः पातु मां सदा ॥ १७॥

ह्रीं ह्रीं ह्रीं कालिके घोरे दंष्ट्रेव रुधिरप्रिये । रुधिरापूर्णवक्त्रे च रुधिरेणावृतस्तनि ॥ १८॥

मम शत्रून् खादय खादय हिंस हिंस मारय मारय भिन्धि भिन्धि , छिन्धि छिन्धि उच्चाटय उच्चाटय द्रावय द्रावय शोषय शोषय स्वाहा । ह्रां ह्रीं कालिकायै मदीयशत्रून् समर्पयामि स्वाहा ।

ॐ जय जय किरि किरि किटि किटि कट कट मर्द मर्द मोहय मोहय ,हर हर मम रिपून ध्वंस ध्वंस , भक्षय भक्षय त्रोटय त्रोटय यातुधानान्चामुण्डे सर्वजनान् राज्ञो राजपुरुषान् स्त्रियो मम वश्यान् कुरु कुरु , तनु तनु धान्यं धनं मेऽश्वान् गजान् रत्नानि दिव्यकामिनीः पुत्रान्रा , जश्रियं देहि यच्छ क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः स्वाहा ।

इत्येतत् कवचं दिव्यं कथितं शम्भुना पुरा । ये पठन्ति सदा तेषां ध्रुवं नश्यन्ति शत्रवः ॥ १९॥

वैरिणः प्रलयं यान्ति व्याधिता या भवन्ति हि । बलहीनाः पुत्रहीनाः शत्रवस्तस्य सर्वदा ॥ २०॥

सहस्रपठनात्सिद्धिः कवचस्य भवेत्तदा । तत्कार्याणि च सिध्यन्ति यथा शङ्करभाषितम् ॥ २१॥

श्मशानाङ्गारमादाय चूर्णं कृत्वा प्रयत्नतः । पादोदकेन पिष्ट्वा तल्लिखेल्लोहशलाकया ॥ २२॥

भूमौ शत्रून् हीनरूपानुत्तराशिरसस्तथा । हस्तं दत्त्वा तु हृदये कवचं तु स्वयं पठेत् ॥ २३॥

शत्रोः प्राणप्रियष्ठां तु कुर्यान्मन्त्रेण मन्त्रवित् । हन्यादस्त्रं प्रहारेण शत्रो गच्छ यमक्षयम् ॥ २४॥

ज्वलदङ्गारतापेन भवन्ति ज्वरिता भृशम् । प्रोञ्छनैर्वामपादेन दरिद्रो भवति ध्रुवम् ॥ २५॥

वैरिनाशकरं प्रोक्तं कवचं वश्यकारकम् । परमैश्वर्यदं चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धिदम् ॥ २६॥

प्रभातसमये चैव पूजाकाले च यत्नतः । सायङ्काले तथा पाठात्सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥ २७॥

शत्रुरुच्चाटनं याति देशाद्वा विच्युतो भवेत् । पश्चात्किङ्करतामेति सत्यं सत्यं न संशयः ॥ २८॥

शत्रुनाशकरे देवि सर्वसम्पत्करे शुभे । सर्वदेवस्तुते देवि कालिके! त्वां नमाम्यहम् ॥ २९॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले कालिकाकल्पे कालिकाकवचं सम्पूर्णम् ॥

2.मंत्र  : ॐ नमो काली कंकाली महाकाली मुख सुन्दर जिह्वा वाली, चार वीर भैरों चौरासी, चार बत्ती पूजूं पान ए मिठाई, अब बोलो काली की दुहाई।

विधि एवं प्रयोग : इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करने से आर्थिक लाभ मिलता है। इससे धन संबंधित परेशानी दूर हो जाती है। माता काली की कृपा से सब काम संभव हो जाते हैं। 15 दिन में एक बार किसी भी मंगलवार या शुक्रवार के दिन काली माता को मीठा पान व मिठाई का भोग लगाते रहें।

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